फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

शुरू हुईं सूर्य उपासना के महापर्व डाला छठ की तैयारियां

विज्ञापन
विज्ञापन
सुल्तानपुर। सूर्य की उपासना के महापर्व डाला छठ की रौनक 20 नवंबर से बढ़ेगी। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत बुधवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो जाएगी।
विज्ञापन

पर्व को लेकर आदि गंगा गोमती के सीताकुंड घाट पर तैयारियां तेज हो गई हैं। नगर पालिका प्रशासन ने छठ पर्व को लेकर सीताकुंड घाट की साफ-सफाई कराने के लिए जिम्मेदारों को निर्देश दिया है। कोरोना संक्रमण की वजह से इस बार सीताकुंड घाट पर भंडारे का आयोजन नहीं किया जाएगा।
दीपावली के बाद छठ महापर्व आता है। चार दिन का तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत बुधवार से हो रही है। बुधवार को ही नहाय खाय है। बृहस्पतिवार को खरना, शुक्रवार को सांझ का अर्घ्य और शनिवार को भोर के अर्घ्य के साथ त्योहार का समापन होगा।
विज्ञापन

छठ भगवान सूर्य की उपासना का पर्व है। ऐसा माना जाता है कि छठ पूजा करने वाले को सुख समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है और व्रती की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। छठ पूजा को मन्नतों का पर्व भी कहा जाता है। छठ का व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है।
छठ करने वाले लगातार 36 घंटों तक उपवास रखते हैं। इस दौरान खाना तो क्या, पानी तक नहीं पीया जाता है। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के मद्देनजर इस बार सीताकुंड घाट पर पूजा अर्चना के लिए छह फिट की दूरी पर पिंड बनाए जा रहे हैं। हर साल की तरह इस बार भंडारे का आयोजन नहीं होगा। जिला प्रशासन की गाइडलाइन के मुताबिक ही लोग पूजा अर्चना करेंगे। ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का अनुपालन किया जा सके।
छठ पर्व का पहला चरण कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय-खाय से होता है। इस दिन पूरे घर की साफ सफाई कर छठवर्ती स्नान करते हैं और खाने में अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू ग्रहण करते हैं। इसी दिन से व्रती बिस्तर पर सोना त्याग देते हैं और व्रत पूरा होने तक बिस्तर पर नहीं सोते हैं।
नहाय खाय के बाद व्रत का अगला चरण खरना होता है। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन व्रतधारी दिन भर उपवास कर शाम को भोजन करते हैं। भोजन में गुड़ की खीर खाते हैं। इस दौरान किसी भी तरह की आवाज आने पर व्रती खाना छोड़ देते हैं। खरना वाले दिन खास तौर पर ध्यान रखा जाता है कि व्रती के कान तक किसी भी तरह का शोर न जाए।
खरना के बाद तीसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को व्रती सारे दिन छठ का प्रसाद बनाते हैं। इस दौरान परिवार के सभी सदस्य पूरी साफ-सफाई के साथ प्रसाद बनाने में मदद करते हैं।
छठी मैया के गीत गाए जाते हैं। शाम के समय बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाकर व्रती अपने परिवार और सगे संबंधियों समेत सूर्य को अर्घ्य देने घाट पर जाते हैं। इस दौरान व्रती पानी में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य देते हैं।
छठ पर्व का चौथा व अंतिम चरण भोर का अर्घ्य है। इस दिन व्रती सुबह सूर्य उगने से पहले पूरे परिवार के साथ डाला लेकर घाट पर जाते हैं और जल में खड़े होकर भगवान सूर्य और छठी मैया से प्रार्थना करते हैं। घाट के किराने प्रसाद रखने के बाद धूप-दीप जलाया जाता है।
महिलाएं छठी मैया के गीत गाती हैं। इस दौरान घाट की छटा देखते ही बनती है। सूर्य उगने के दौरान कच्चे दूध को सूप में डालकर भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती का व्रत पूरा होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें