सुल्तानपुर। पितृपक्ष का शुभारंभ सोमवार से हो रहा है। इस दौरान 15 दिनों तक मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा। पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और तर्पण किया जाएगा। पितृपक्ष में श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करने से पितरों की कृपा बरसती है।
पितृपक्ष का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना गया है। यह भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर अश्विन अमावस्या तक चलता है। पितृपक्ष की शुरुआत सोमवार से हो रही है। इसका समापन 21 सितंबर को होगा। यह अवधि पितरों को समर्पित मानी गई है। इस दौरान श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने की परंपरा है।
ज्योतिषाचार्य रामकिशोर त्रिपाठी कहते हैं कि धार्मिक मान्यता के मुताबिक पितृ पक्ष में पूर्वज किसी न किसी रूप में अपने वंशजों के घर आते हैं। तिथि के अनुसार ही पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। यदि भूलवश किसी को अपने पितर की तिथि नहीं पता है तो वह अमावस्या के दिन श्राद्ध और तर्पण कर सकता है।
पितृपक्ष में नहीं होंगे ये काम
पितृपक्ष के दौरान 15 दिनों तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार और नए सामानों की खरीद नहीं की जाती है। पितृपक्ष में लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने के लिए गया धाम जाते हैं।
21 को होगा पितृ विसर्जन
श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करना चाहिए। ऐसा करने से पितर खुश होते हैं। मातृ नवमी का श्राद्ध 15 सितंबर को है। 21 सितंबर अमावस्या के दिन पितरों की विदाई की जाएगी। - बृजेशाचार्य महाराज, कथा प्रवाचक।