मार्च 2020 में लॉकडाउन के समय का नजारा। फाइल फोटो
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सुल्तानपुर। कोविड के खतरे की आशंका के बीच सरकार ने 2020 में आज ही के दिन पहला लॉकडाउन लगाया था। एक दिन के अंतराल के बाद लॉकडाउन की समय सीमा बढ़ा दी गई। उसके बाद लोग अपने घरों में कैद हो गए। लॉकडाउन का प्रभाव परिवार से लेकर समाज तक और बाजार से लेकर खेती-बाड़ी तक पर पड़ा। दवा व्यवसाय को छोड़ दें तो बाजार का कोई भी ऐसा सेक्टर नहीं रहा, जिसे लॉकडाउन ने प्रभावित न किया हो।
लॉकडाउन लगते ही सारे लोग घरों में कैद हो गए। कोई अगर किसी काम से दस-पांच मिनट के लिए निकलता भी था तो घर में प्रवेश करते ही साबुन से हाथ धोना उसकी दिनचर्या में शुमार हो गया। बाहर से घर में प्रवेश करने वाला व्यक्ति अपने पारिवारिक सदस्यों के साथ कुछ समय की दूरी बनाकर रखता था। लोग अपने मोहल्लों तक के लोगों से दूर हो गए। लोगों से संपर्क का एकमात्र जरिया फोन ही रह गए। न कोई किसी से मिलना चाहता था न ही कोई किसी के घर जाना चाहता था। अधिकतर लोगों का करीबी लोगों से भी ऐसा बर्ताव हो गया कि जैसे वे उन्हें जानते ही नहीं।
कहने के लिए सब्जियों, दूध और गैस सिलेंडर की होम डिलीवरी की व्यवस्था की गई थी लेकिन लोगों ने इनसे भी यथासंभव दूरी बनाकर रखी। बाहर से घर में आने वाले सामानों को कोई सात-आठ घंटे तक हाथ तक नहीं लगाता था। उसके बाद ही उसे प्रयोग में लाया जाता था। गांव से लेकर शहर और सडक़ से लेकर बाजार तक हर ओर सन्नाटा ही सन्नाटा। रिहायशी इलाके ऐसे दिखते थे मानो यहां के लोगों ने इसे छोडकऱ कहीं और बसेरा बना लिया है। कहते हैं कि मानव ही नहीं, हर जीव जंतु का स्वभाव ही ऐसा होता कि वह जिजीविषा के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करता है। सो लॉकडाउन में भी इंसान ने न केवल खुद को संभाला बल्कि माहौल के अनुकूल जीना भी सीख लिया।
रेहड़ी-पटरी दुकानदारों के समक्ष दो जून की रोटी के इंतजाम का संकट था, वहीं बड़े प्रतिष्ठानों के सामने खुद को स्थापित रखने की चुनौती। तमाम लोगों ने आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए मोहल्ले-मोहल्ले राशन की किट बांटी। लॉकडाउन में राशन वितरण की होड़ लगी रही। कुछ लोगों ने तो गली-मोहल्लों के आवारा कुत्तों के साथ ही कादूनाला के पास टहलने वाले बंदरों तक को भोजन मुहैया कराया। बड़े प्रतिष्ठानों के संचालकों ने अपने यहां काम करने वालों की आजीविका का ख्याल रखा। ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जहां प्रतिष्ठान संचालकों ने अपने कर्मचारियों का वेतन बहाल रखा।
इलेक्ट्रॉनिक शोरूम संचालक राजेंद्र अग्रवाल बताते हैं कि व्यवसाय ठप होने से बिजली-पानी से लेकर कर्मचारियों की तनख्वाह तक का इंतजाम करना बड़ी चुनौती थी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में हमने न किसी कर्मचारी को निकाला न ही उनकी तनख्वाह रोकी। होटल व्यवसायी संदीप कुमार ने बताया कि बहुत बुरा दौर था लेकिन हम सबने हौसला बनाकर रखा। हमने किसी कर्मचारी को निकाला नहीं। कर्मचारियों को नियमित तनख्वाह दी। उनके भोजन-पानी का ध्यान रखा।