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चढ़ावा कम होने से सीमित खर्च से हो रही मंदिरों की देखरेख

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सुल्तानपुर। वैश्विक महामारी कोविड-19 की रोकथाम के लिए सरकार ने 22 मार्च से 31 मई तक लॉकडाउन लगा दिया था। लॉकडाउन की वजह से जिले के अधिकांश मंदिरों के कपाट पूरी तरह बंद कर दिए थे। इस दौरान चढ़ावा बंद हो जाने से सीमित ढंग से मंदिरों का खर्च चलाया जा रहा था।
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मंदिर के पुजारियों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था। साथ ही मंदिरों के सामने फूल-माला व प्रसाद बेचने वाले लोगों ने दूसरे काम पकड़ लिए थे। अनलॉक-1 में धीरे-धीरे मंदिरों की व्यवस्था पटरी पर आने लगी है।
लॉकडाउन के चलते शहर के अधिकतर मंदिरों में ताले लग गए थे। ऐसा पहली बार हुआ, जब नवरात्र के दिनों में मंदिरों में पूजा-पाठ नहीं हुआ। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं हुए। इससे मंदिर के पुरोहितों की आय भी बंद हो गई है।
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लॉकडाउन के कारण पुरोहितों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। लॉकडाउन की वजह से मंदिरों का खर्च बहुत ही सीमित ढंग से चलाया स्त्रत्त्जा रहा था। अनलॉक-1 में शर्त के अनुसार छूट मिली तो धीरे-धीरे व्यवस्था पटरी पर आनी शुरू हो गई। यही हाल मंदिरों के सामने प्रसाद व फूल-माला व प्रसाद बेचने वालों का भी था। लॉकडाउन की अवधि तक फूल-माला व प्रसाद बेचने वाले लोव्गों ने दूसरे काम पकड़ लिए थे।
लंभुआ। बाबा जनवरीनाथ धाम परिसर में फूल-माला व प्रसाद की करीब दो दर्जन दुकानें लगती थीं। सोमवार व शनिवार के अलावा सावन व मलमास में इन दुकानदारों की अच्छी कमाई हो जाती थी। इस बार लॉकडाउन में मंदिर और दुकानें बंद करवा दी गई थीं।
कस्बा निवासी आशीष माली इसी परिसर में दुकान लगाते हैं। सप्ताह में दो दिन सोमवार और शनिवार को फूलों की खरीदारी वाराणसी की फूल मंडी से होती थी। श्रप्रालुओं की संख्या कम होने की वजह से परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। सावन माह में भी श्रद्धालुओं व कावडिय़ों के निकलने पर रोक लगाई गई है। इस वजह से इस माह में भी कमाई के आसार नहीं दिख रहे हैं। यही हाल रंजीत माली, देवेंद्र माली, अंकित माली का भी है।
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