मान्यता के बगैर चिकित्सा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिला देने का खामियाजा डॉक्टरों को भुगतना पड़ रहा है। एक मामले में हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने आरएमएल अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद व अन्य की तरफ से दायर विशेष अपील पर एकल न्यायाधीश की अदालत के 4 जून के आदेश पर रोक लगा दी है।
एकल पीठ ने इस आदेश में डॉ. उत्कर्ष सहाय व अन्य को 5 जून से होने वाली परीक्षा में शामिल किए जाने के निर्देश दिए थे। साथ ही कहा था कि इनका रिजल्ट भी घोषित किया जाएगा जो याचिका के नतीजे के अधीन होगा। विश्वविद्यालय की तरफ से एकल न्यायाधीश के इस आदेश को विशेष अपील दायर कर दो न्यायाधीशों की खंडपीठ में चुनौती दी गई है।
न्यायमूर्ति सत्येंद्र सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा की खंडपीठ ने सोमवार को एकल पीठ के 4 जून के आदेश पर अगली सुनवाई की तारीख 2 जुलाई तक के लिए रोक लगा दी।
क्या है सच्चाई
अपीलकर्ता विश्वविद्यालय की तरफ से कहा गया कि संबंधित संस्थान (कॉलेज) को सिर्फ सत्र 2009.10 के लिए विश्वविद्यालय ने मान्यता दी थी और इस बैच के छात्र 2012 में परीक्षा पास कर गए थे। इसके बाद कॉलेज ने सत्र 2010.11 के लिए एमएस (ऑर्थोपेडिक्स), एमडी (रेडियोलॉजी) एवं एमएस की मान्यता नहीं ली और दाखिले कर लिए जो कानून की मंशा के खिलाफ है।
'नहीं दिया जाना चाहिए दाखिला'
इसके अलावा यह भी दलील दी गई कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया एमसीआई ने सिर्फ सत्र 2009.10 के लिए मान्यता दी थी। 2010 बैच के लिए एमसीआई ने मान्यता नहीं दी थी। विश्वविद्यालय की तरफ से यह भी तर्क दिया गया कि संस्थान द्वारा बगैर संबद्धता के छात्रों को कानूनन दाखिला नहीं दिया जाना चाहिए।
खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के बाद 4 जून के एकल पीठ के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। साथ ही अपीलकर्ता विश्वविद्यालय के अधिवक्ता को निर्देश दिया कि एमसीआई को मामले में पक्षकार बनाएं। कोर्ट ने एमसीआई को नोटिस भी जारी किया है तथा मामले की अगली सुनवाई दो जुलाई को नियत की है।