सोनभद्र। अच्छा स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। सोनभद्र के जंगलों में सेहत का यही खजाना छिपा हुआ है। यहां ऐसी जड़ी-बूटियाें का भंडार है, जिन्हें गंभीर बीमारियों में बेहद कारगर माना जाता है। आदिवासी समाज इलाज में इन्हीं जड़ी-बूटियों का उपयोग करता आ रहा है। आयुर्वेद के विशेषज्ञ भी यहां मिलने वाली जड़ी-बूटियों को अनमोल मानते हैं। अगर इनका संरक्षण और संवर्द्धन किया जाए तो विकसित यूपी के साथ वनवासियों की समृद्धि का भी जरिया बनेंगे।
सोनभद्र में यूपी का सबसे बड़ा वन क्षेत्र है। करीब 2540.2 वर्ग किमी में फैले यहां के जंगल तीन प्रभाग (डिविजन) में बंटे हुए हैं। तीनों प्रभाग में इमारती पेड़ों के साथ औषधीय पौधों का बड़ा भंडार है। हर्रा, बहेड़ा, बेल, आंवला, अर्जुन, अश्वगंधा, गिलोय, चिरायता, महुआ, सतावर, हल्दु, नीम, जामुन, चिरौंजी, सीरिस, कालमेघ, ब्राह्मी, शिकाकाई, घीकुमार, वज्रदंति, अम्लतास, पुनर्नवा, सेमर, इंद्रायन, काली मूसली, अमरबेल, भृंगराज, तुलसी, वन तुलसी, गुरमार, शंखपुष्पी जैसी 143 तरह की जड़ी-बूटियां यहां बड़ी मात्रा में हैं।
यह 56 प्रजातियों से जुड़े हुए हैं। विभिन्न प्रकार की आयुर्वेदिक दवाओं में इनका उपयोग बड़े पैमाने पर होता है। जड़ी-बूटियों की परख रखने वाले व्यापारी जिले के ग्रामीण इलाकों से इनका संग्रह कर बड़ी मंडियों में भेजते हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में स्थानीय लोगों का इसका अधिक लाभ नहीं मिल पा रहा। आदिवासी समाज इससे अपना दवा-उपचार तो करता है, लेकिन व्यापारिक लाभ से वंचित है।
जानकारों का दावा है कि अगर जंगलाें में बिखरी इन जड़ी बूटियों का संरक्षण करते हुए इससे बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था हो तो न सिर्फ आयुर्वेद चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि होगी, बल्कि अभावों में जी रहे आदिवासी परिवार भी समृद्ध होंगे। विकसित यूपी की संकल्पना में सबसे पीछे खड़े सोनभद्र के यह इलाके आगे बढ़ेंगे।
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किस जड़ी-बूटी का क्या है उपयोग::
विजयसार: अपने कसैले गुण के कारण मधुमेह से संबंधित लक्षणों जैसे बार-बार पेशाब आना, अत्यधिक प्यास लगना, थकान और अधिक भोजन करने को नियंत्रित करने में मदद करता है।
अर्जुन: इसकी छाल हृदय को मजबूत बनाने, रक्तचाप नियंत्रित करने और रक्त संचार में सुधार करने के लिए उपयोगी है।
चिरायता: मधुमेह को नियंत्रित करना, लिवर को स्वस्थ रखना, प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत करने, पाचन में सुधार और त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करता है।
बहेड़ा: यह श्वसन और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है। प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है। खांसी, कब्ज जैसी समस्याओं से राहत देता है। बालों, आंखों के स्वास्थ्य और त्वचा की समस्याओं के लिए भी फायदेमंद है।
सतावर: महिला प्रजनन स्वास्थ्य को बढ़ावा देना, पाचन में सुधार, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना, तनाव कम करना और हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में उपयोगी।
गिलोय: प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने, बुखार और खांसी को ठीक करने, पाचन में सुधार, मधुमेह, गठिया जैसी कई बीमारियों के इलाज में उपयोगी।
अश्वगंधा: तनाव और चिंता को कम करना, नींद में सुधार, ऊर्जा और सहनशक्ति बढ़ाना, और मानसिक कार्यों जैसे याददाश्त को बेहतर बनाना शामिल है।
सेमल: मुंहासे, फुंसी, दांत दर्द, फिस्टुला, अल्सर।
चिंरौजी-पियार: ब्रोंकाइटिस, खांसी, दस्त, सूजन, मसूड़े से संबंधित।
ढाक-पलाश: गर्भपात करने वाला, प्रजनन क्षमता, रक्तस्राव, कृमिनाशक।
मदार-आक: गर्भपात, शरीर दर्द, जलन, दाद, चेचक, सूजन आदि।
कालमेघ: हैजा, डायरिया, बुखार, फाइलेरिया आदि।
ग्वारपाठा-घीकुमार: बुखार, कृमिनाशक, त्वचा बीमारी आदि।
बेल-श्रीफल: कब्ज, मधुमेह, पेचिस, नेत्र रोग, गैस्टि्रक, पेट में गर्मी आदि।
हल्दू: हैजा, सर्दी, कफ, बुखार, सिर दर्द, शरीर का पीला पड़ना।
खैर-कत्था: छाती में दर्द, प्रदर रोग, दांत दर्द आदि।
नीम: अपच, खुजली, त्वचा रोग, चेचक, मलेरिया, खसरा आदि।
अम्लतास: अस्थमा, छाती संक्रमण, खांसी, सूजन आदि।
मोथा: कसैला, हीट स्ट्रोक, घाव, मूत्र शिकायत।
इंद्रजौ: कब्ज, गैस, पाचन संबंधी रोग।
चिलबिल: हड्डी टूटना, फोड़ा, शरीर सूजन, गठिया आदि।
गुरमार: नेत्ररोग, मधुमेह, गैस्टि्रक, पेट रोग।
वर्जन...
रेणुकूट वन प्रभाग में जो भी औषधि युक्त पौधे हैं उनके संरक्षण के लिए वन कर्मी नियमित भ्रमण करते हैं। उसके कटान न होने के लिए निगरानी की जाती है। वन मंत्री के निर्देश पर अपनी नर्सरी में इन पौधों को लगाकर ग्रामीणों को वितरित किया जाएगा, जिससे वह उनका संरक्षण करें और उससे उत्पादन लेकर अपनी आजीविका का साधन बनाएं। -कमल कुमार, प्रभागीय वनाधिकारी, रेणुकूट।
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वर्जन...
सोनभद्र के जंगलों में वन औषधियां प्रचुर मात्रा में हैं। इनमें कई ऐसी जड़ी-बूटियां हैं, जो कहीं और नहीं मिलतीं। आयुर्वेदिक चिकित्सा में इनका वृहद स्तर पर उपयोग होता है। जागरूकता और सही पहचान न होने के कारण लोग इनका उचित उपयोग नहीं कर पा रहे। - डॉ. रमन विश्वकर्मा, जिला आयुर्वेद अधिकारी