वर्ष 2017 के चुनाव में अनुसूचित जनजाति की सीट पर भाजपा ने संजीव सिंह गोंड के रूप में बिलकुल नया चेहरा उतारा था। मोदी लहर में वह जीतकर विधानसभा पहुंचे तो भाजपा के एकमात्र आदिवासी विधायक बने। मंत्रिमंडल के अंतिम विस्तार में सरकार ने संजीव सिंह गोंड का कद बढ़ाते हुए उन्हें राज्य मंत्री का जिम्मा सौंपा। लंबे समय बाद अपने समाज से मंत्री बनाए जाने पर गौरवान्वित आदिवासी समाज ने संजीव सिंह गोंड को दोबारा मौका देने में कोताही नहीं की। जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट पर सामान्य व अन्य पिछड़ा वर्ग ने भी अन्य प्रत्याशियों को चुनने की बजाय संजीव पर ही भरोसा जताया। इसके पीछे यह उम्मीद भी रही कि सरकार बनने पर फिर कोई बड़ा ओहदा उन्हें जरूर मिलेगा।
जनजातीय वर्ग के लिए आरक्षित उत्तर प्रदेश की दो सीटों में से एक ओबरा भी है। यहां के नगरीय इलाके भाजपा के गढ़ माने जाते हैं। आदिवासी वोटरों को साधने के लिए भाजपा सरकार ने मंत्रिमंडल के अंतिम विस्तार में संजीव सिंह गोंड को शामिल किया था। गोंड जाति की इस इलाके में बड़ी संख्या है। ओबरा के अलावा वह दुद्धी सीट को भी प्रभावित करते हैं। इसी वर्ग से पूर्व में सपा की सरकार में विजय सिंह गोंड भी मंत्री रहे हैं। जनजातीय की बहुल बिरादरी को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का यह दांव पूरी तरह सफल रहा। मंत्री बनने के बाद से ही संजीव गोंड की जीत पक्की मानी जा रही थी। सपा और कांग्रेस से भी स्वजातीय उम्मीदवार आने के बाद वोटों में बिखराव की आशंका थी, लेकिन अपने कार्यकाल में सरलता और सहजता के कारण संजीव जनता का भरोसा पाने में कामयाब रहे।