जिला प्रशासन की अनदेखी के चलते जिले के नक्सल प्रभावित इलाकों में अधिकतर इंदिरा आवास खंडहर हो गए हैं। इन आवासों में न दरवाजे लगे हैं और न खिड़कियां।
कर्मचारियों की मिलीभगत से सरकार से आवास की दूसरी किस्त भी लेने के बावजूद लाभार्थियों ने घर का काम पूरा नहीं कराया। वे अर्धनिर्मित मकानों को छोड़ कच्चे घरों में रह रहे हैं। अति संवेदनशील चेरूई, समदा आदि इलाकों में तो हालत और भी खराब हैं। अब अधिकारी इस मामले की जांच कराने की तैयारी कर रहे हैं।
सरकार ने जिले में पिछले दस वर्षों में अरबों रुपये इंदिरा आवास के निर्माण के लिए दिये लेकिन उनकी उपयोगिता शायद ही कहीं सिद्ध पाई जा रही हो। महज पांच साल पूर्व ही बने इंदिरा आवासों ने खंडहर का रूप ले लिया है। आवास बेकार पड़े हैं। लाभार्थी कच्चे मकान में रहने को विवश हैं।
नगवां ब्लाक के नक्सल प्रभावित गांवों में शुमार समदा में घूरन के नाम से तीन साल पूर्व ही इंदिरा आवास बना। उसमें न दरवाजा लगा और न ही खिड़की। देखने से ही प्रतीत होता है मनुष्य के रहने का मकान के बजाय जानवरों का बाड़ा हो। इसी गांव में बने तीन अन्य इंदिरा आवासों का भी यही हाल है।
ऐसा ही हाल नक्सल प्रभावित चेरूई का है। यहां बने इंदिरा आवास में तो छत भी नहीं पड़ी है। लाभार्थी इस आवास में जलावनी लकड़ी रख रहे हैं। रायपुर गांव में 15 इंदिरा आवास में से आधे आवास का भी निर्माण पूर्ण नहीं हो सका है। यहां इस्लाम, लल्ला, साबिर, पारम, मुश्ताक आदि को इंदिरा आवास आवंटित तो हुए लेकिन अब तक वे अधूरे ही हैं।
इसी गांव के दल्लू, केदारथ और गांधी के नाम आवंटित आवासों का निर्माण पैसा नहीं मिलने के कारण अब तक शुरू नहीं हो सका है। कमोवेश ऐसा ही हाल नगवां ब्लाक के अन्य गांवों का भी है। जहां आवास निर्माण के नाम पर पिछले एक दशक में गड़बड़ी की गई है लेकिन जांच के नाम पर जिम्मेदार कोरम की अदायगी कर पल्ला झाड़ ले रहे हैं।