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सूखी राख से गिट्टी बनाने का तरीका ईजाद

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शक्तिनगर। देश की सबसे बड़ी विद्युत उत्पादक कंपनी एनटीपीसी ने फ्लाई ऐश (सूखी राख) से गिट्टी बनाने का तरीका ईजाद किया है। कंपनी को जियो-पॉलिमर कॉर्स एग्रीगेट विकसित करने में सफलता मिली है। राख को गिट्टी के रूप में तब्दील करने से न सिर्फ पत्थर के पहाड़ बचेंगे बल्कि पानी की भी बचत होगी क्योंकि राख से बनी गिट्टी में सीमेंट मिलाने की जरूरत नहीं होगी।
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एनटीपीसी सिंगरौली के प्रवक्ता आदेश कुमार पांडेय ने बताया कि फ्लाई ऐश से जियो-पॉलिमर कॉर्स एग्रीगेट के उत्पादन पर एनटीपीसी के रिसर्च प्रोजेक्ट ने भारतीय मानकों के वैधानिक मापदंडों को पूरा किया है। इसकी पुष्टि नेशनल काउंसिल फॉर सीमेंट एंड बिल्डिंग मैटीरियल्स और निर्माण सामग्री (एनसीसीबीएम) ने की है। एनटीपीसी ने प्राकृतिक एग्रीगेट के विकल्प के रूप में जियो-पॉलिमर कॉर्स को सफलतापूर्वक विकसित किया है। कंक्रीट कार्यों में उपयोग करने के लिए उपयुक्त होने के बारे में तकनीकी मानकों का परीक्षण एनसीसीबीएम, हैदराबाद ने किया था और इसके परिणाम भी आए हैं। यह एनटीपीसी की उपलब्धि है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर साल पत्थर की गिट्टी, खंड की मांग कुल मिलाकर 2000 मिलियन मीट्रिक टन के करीब पहुंच जाती है। एनटीपीसी द्वारा फ्लाई ऐश से विकसित गिट्टी आदि मांग को काफी हद तक पूरा करने में मदद करेगी। पर्यावरण पर प्राकृतिक एग्रीगेट्स के इस्तेमाल से होने वाले प्रभाव को कम करेगी। प्राकृतिक एग्रीगेट के लिए पत्थर के उत्खनन की आवश्यकता होती है।
इनसेट:
पैदा होती है 258 एमएमटी राख
शक्तिनगर। देश में कोयले से चलने वाले थर्मल पावर प्लांटों की ओर से हर साल लगभग 258 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) राख उत्पादित की जाती है। इसमें से लगभग 78 प्रतिशत राख का उपयोग किया जाता है और शेष राख अनुपयोगी रह जाती है। शेष राख का उपयोग करने के लिए एनटीपीसी वैकल्पिक तरीकों की खोज कर रहा है।
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इनसेट:
निर्माण कार्य में होगा इस्तेमाल
शक्तिनगर। जियो-पॉलिमर एग्रीगेट का इस्तेमाल निर्माण उद्योग में किया जाता है। इस तरह राख को पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है। यह गिट्टी के अत्यंत अनुकूल है और कंक्रीट में इस्तेमाल करने के दौरान इसके साथ किसी भी प्रकार की सीमेंट की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि इसमें फ्लाई ऐश आधारित जियो-पॉलिमर मोर्टार इसे पक्का करने के काम आता है। जियो-पॉलिमर गिट्टी से कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी और इससे पानी की खपत को भी कम किया जा सकेगा।
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