रविवार रात होलिका दहन, सोमवार सुबह होली गाते ग्रामीण
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गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत पहले एक बार गांव में भारी धन-जन की क्षति हुई थी और गांव में महामारी जैसी स्थिति हो गई थी। गांव के लोग काफी परेशान थे तब उसका निदान ढूंढने के लिए आदिवासियों ने काफी पहल किया।
उस समय आदिवासी समुदाय के बुजुर्ग लोगों एवं धर्माचार्यों ने चार-पांच दिन पहले होली मनाने का सुझाव दिया था। तभी से बैरखड़ गांव में होली मनाने की परंपरा चल पड़ी, जिसे आदिवासी समाज आज भी संजोए हुए हैं। गांव के लोग बताते हैं कि गांव में सुख समृद्धि बनी रहती हैं।
दुद्धी ब्लॉक क्षेत्र के बैरखड़ में सोमवार को आदिवासियों ने परंपरागत तरीके से होली खेली। वहां मानर की थाप पर होली खेलने की परंपरा आज भी कायम है। बैरखड़ गांव आदिवासी जनजाति बाहुल्य गांव हैं। यहां के निवासी हर त्योहार अपनी परंपरा एवं रीति रिवाज के अनुसार मनाते हैं।
वैसे भी इस जनजाति का इतिहास प्राचीन काल तक जाता है। ये लोग समूह में इकट्ठा होकर एक-दूसरे को अबीर लगाते है और मानर नामक वाद्ययंत्र की धुन पर नृत्य करते हैं। इस नृत्य में महिलाएं भी शामिल रहती हैं।
नियत तिथि पर होली नहीं मनाने का कारण
बैरखड़ के वर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल, पूर्व प्रधान अमर सिंह, छोटेलाल सिंह ,रामकिशुन सिंह बताते है कि किसी समय होली के दिन सभी आदिवासी लोग नशे में आनंदित थे। सभी लोग नाच-गा रहे थे, तभी किसी अनहोनी घटना में कई लोगों की एक साथ मौत हो गई थी।
तब आदिवासी धर्माचार्यों ने होली मनाने की परंपरा नियत तिथि से पूर्व मनाने की सलाह दी। उसके बाद से गांव में चार-पांच दिन पहले होली मनाई जाने लगी और गांव सुख शांति और अमन चैन कायम हो गई तब से ही गांव में जिंदा होली मनाने की परंपरा हो चली जो अब तक जारी है।
उन्होंने बताया कि होलिका दहन वैगा या अपनी ही बिरादरी के मनोनीत वैगा या पंडित लोगों से कराने की प्रथा है। इस स्थल को संवत डाड़ कहा जाता है। जहां होलिका दहन के अगले दिन होलिका दहन के अवशेष को उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हुए अपने ईष्ट देव की आराधना एवं पूजा-पाठ करते हैं।