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अलग ही चलन: यूपी का एक गांव ऐसा जहां पांच दिन पहले मनाई गई होली , जानिए क्या है कारण

Mon, 14 Mar 2022 03:13 PM IST
उत्पल कांत अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र

सार

बैरखड़ गांव में रविवार रात होलिका दहन हुआ। सोमवार को आदिवासियों ने रंगों का त्योहार होली परंपरागत तरीके से मनाई। आदिवासी समाज के लोग सुबह से ही रंगों से सराबोर होकर झूमते रहे। 
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बैरखड़ गांव में होली मनाते ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश में अनेक सभ्यता एवं संस्कृति के लोग रहते हैं। शादी-विवाह एवं त्योहारों को मनाने का अलग-अलग अंदाज है। यूपी के सबसे आखिरी छोर पर बसे दुद्धी ब्लॉक के आदिवासी बहुल गांव  बैरखड़ ग्राम पंचायत में होली मनाने का एक अलग ही चलन है।

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बैरखड़ गांव में पांच दिन पहले होली मनाने की परंपरा वर्षो से चली आ रही है। इसके वर्तमान स्वरूप में प्राचीन काल की संस्कृति की झलक दिखाई पड़ रही है। बैरखड़ गांव में रविवार रात होलिका दहन हुआ। सोमवार को आदिवासियों ने रंगों का त्योहार होली परंपरागत तरीके से मनाई।

आदिवासी समाज के लोग सुबह से ही रंगों से सराबोर होकर झूमते नजर आते रहे। गांव के बड़े बुजुर्गो का कहना है कि बैरखड़ गांव के आदिवासी पांच दिन पहले होली का त्योहार परंपरा के अनुसार मनाते हैं। पहले होली मनाने की परंपरा को लेकर ग्राम प्रधान उदय पाल कहते हैं कि ये परंपरा काफी पुरानी है। नियत तिथि से पांच दिन पहले की इस परंपरा को जिंदा होली कहते हैं।

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वर्षों पुरानी है ये परंपरा

रविवार रात होलिका दहन, सोमवार सुबह होली गाते ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत पहले एक बार गांव में भारी धन-जन की क्षति हुई थी और गांव में महामारी जैसी स्थिति हो गई थी। गांव के लोग काफी परेशान थे तब उसका निदान ढूंढने के लिए आदिवासियों ने काफी पहल किया।

उस समय आदिवासी समुदाय के बुजुर्ग लोगों एवं धर्माचार्यों ने चार-पांच दिन पहले होली मनाने का सुझाव दिया था। तभी से बैरखड़ गांव में  होली मनाने की परंपरा चल पड़ी, जिसे आदिवासी समाज आज भी संजोए हुए हैं। गांव के लोग बताते हैं कि गांव में सुख समृद्धि बनी रहती हैं।

मानर की थाप पर झूमे पुरुष और महिलाएं

रविवार रात होलिका दहन - फोटो : अमर उजाला
दुद्धी ब्लॉक क्षेत्र के बैरखड़ में सोमवार को आदिवासियों ने परंपरागत तरीके से होली खेली। वहां मानर की थाप पर होली खेलने की परंपरा आज भी कायम है। बैरखड़ गांव आदिवासी जनजाति बाहुल्य गांव हैं। यहां के निवासी हर त्योहार अपनी परंपरा एवं रीति रिवाज के अनुसार मनाते हैं।

वैसे भी इस जनजाति का इतिहास प्राचीन काल तक जाता है। ये लोग समूह में इकट्ठा होकर एक-दूसरे को अबीर लगाते है और मानर नामक वाद्ययंत्र की धुन पर नृत्य करते हैं। इस नृत्य में महिलाएं भी शामिल रहती हैं।

नियत तिथि पर  होली नहीं मनाने का कारण
बैरखड़ के वर्तमान ग्राम प्रधान उदय पाल, पूर्व प्रधान अमर सिंह, छोटेलाल सिंह ,रामकिशुन सिंह बताते है कि किसी समय होली के दिन सभी आदिवासी लोग नशे में आनंदित थे। सभी लोग नाच-गा रहे थे, तभी किसी अनहोनी घटना में कई लोगों की एक साथ मौत हो गई थी।
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तब आदिवासी धर्माचार्यों ने होली मनाने की परंपरा नियत तिथि से पूर्व मनाने की सलाह दी। उसके बाद से गांव में चार-पांच दिन पहले होली मनाई जाने लगी और गांव सुख शांति और अमन चैन कायम हो गई तब से ही गांव में जिंदा होली मनाने की परंपरा हो चली जो अब तक जारी है।

उन्होंने बताया कि होलिका दहन वैगा या अपनी ही बिरादरी के मनोनीत वैगा या पंडित लोगों से कराने की प्रथा है। इस स्थल को संवत डाड़ कहा जाता है। जहां होलिका दहन के अगले दिन होलिका दहन के अवशेष को उड़ाते हुए दिनभर होली खेलते हुए अपने ईष्ट देव की आराधना एवं पूजा-पाठ करते हैं।
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