बिजलीघरों से निकलती राख के निस्तारण को लेकर अच्छी पहल सामने आई है। एनसीएल प्रबंधन ने देश के सबसे बड़े विद्युत गृह एनटीपीसी विंध्याचल को गोरबी में अनुपयोगी पड़ी कोल खदान में राख पाटने के प्रस्ताव पर सहमति जता दी है। इससे अन्य परियोजनाओं के लिए भी राख निस्तारण का एक बेहतर विकल्प सामने आया है। जिले की निष्प्रयोज्य एवं मानक से अधिक गहरी खदानों में भी इसकी अनुमति दे दी जाए तो राख निस्तारण, पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए यह पहल फायदेमंद होगी।
विंध्याचल बिजलीघर में रोजाना 70 से 72 हजार टन कोयले की खपत होती है। इससे प्रतिदिन यहां 21 से 22 हजार टन राख निकलती है। ऐसे में परियोजना के समक्ष राख निस्तारण बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसको देखते हुए पिछले दिनों परियोजना के ईडी राजेश कुमार भटनागर ने एनसीएल के सीएमडी टीके नाग से मुलाकात की और एनसीएल की गोरबी में निष्प्रयोज्य पड़ी कोयला खदान में राख पाटने का प्रस्ताव रखा। जिस पर एनसीएल प्रबंधन ने भी सहमति जता दी है।
हालांकि एनओसी सहित अन्य औपचारिकताएं एनटीपीसी विंध्याचल को ही पूरी करनी होगी। कार्यकारी निदेशक राजेश कुमार ने भी इसकी पुष्टि की। बताया कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग और खान सुरक्षा विभाग से एनओसी लेकर राख निस्तारण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। ऊर्जांचल स्थित बिजलीघरों में राख निस्तारण बड़ा मुद्दा है।
यहां महज एक दिन सवा लाख टन के करीब राख निकलती है।
ऐसे में ताजा पहल अन्य परियोजनाओं के लिए भी नया विकल्प बनाने का रास्ता तैयार कर सकती है। बशर्ते इसकी पहल बिजलीघरों को ही करनी पड़ेगी। जिले के ओबरा, डाला खनन क्षेत्र में कई खदान ऐसी हैं जो या तो निष्प्रयोज्य हैं, या फिर मानक से अधिक खुदाई हो चुकी है। ऐसे में जिला प्रशासन और परियोजना प्रबंधन इन खदानों को राख निस्तारण का बेहतर विकल्प बना सकता है।