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Sonebhadra News: अस्पताल में नहीं मिले डॉक्टर, जारी किए नोटिस

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सोनभद्र/चोपन। बिना पंजीकरण के संचालित हो रहे निजी अस्पतालों की जांच के लिए नोडल अधिकारी डॉ. जीएस यादव बृहस्पतिवार को चोपन पहुंचे। उन्होंने तीन अस्पतालों की जांच की। वहां कई खामियां मिलीं, लेकिन यह तय नहीं हो पाया कि अस्पताल पंजीकृत हैं या नहीं। नोडल के पास खुद ऐसे अस्पतालों की सूची नहीं थी, जो विभाग में पंजीकृत हैं। संबंधितों को नोटिस देकर शुक्रवार तक दस्तावेज सीएमओ कार्यालय में प्रस्तुत करने को कहा गया।
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नोडल अधिकारी डॉ. गुलाब शंकर की जांच के दौरान एक अस्पताल में कोई एमबीबीएस डॉक्टर मौजूद नहीं मिला। एसीएमओ ने स्पष्ट किया कि अस्पताल में फुल टाइम एमबीबीएस डॉक्टर का होना अनिवार्य है। वहीं दूसरे अस्पताल में न तो फायर एनओसी प्रस्तुत की गई और न पर्यावरण एनओसी दिखाई गई। संचालक की ओर से दिखाए गए रजिस्ट्रेशन पेपर पर हस्ताक्षर भी नहीं थे। अस्पताल अपने आप को ट्राॅमा सेंटर कहता रहा, जबकि नियमानुसार आवश्यक डॉक्टर मौजूद नहीं थे। तीसरे अस्पताल की भी हालत संतोषजनक नहीं थी। जांच के दौरान न तो कोई डॉक्टर मिला और न ही रजिस्ट्रेशन के कागजात दिखाए जा सके। एसीएमओ ने तीनों अस्पतालों के संचालकों को नोटिस देकर शुक्रवार तक दस्तावेज सीएमओ कार्यालय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। कहा कि कार्यालय में आने पर प्रमाणित होगा कि यह अस्पताल पंजीकृत हैं कि नहीं। तय अवधि में वैध कागजात नहीं दिखाए गए तो न केवल कार्रवाई होगी, बल्कि भविष्य में भी इन अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाएगा। बताया कि पूरे जिले में अभी 62 अस्पताल पंजीकृत हैं।
अवैध अस्पतालों को विभाग का संरक्षण
अति पिछड़े जिले में बिना पंजीकृत अस्पतालों का संचालन धड़ल्ले से हो रहा है। ग्रामीण अंचलों में बिना डिग्री और लाइसेंस के क्लीनिक खोलकर मरीजों का उपचार किया जा रहा है। बीमारी साधारण हो या फिर गंभीर। बिना डिग्री वाले कथित डॉक्टर उसका सटीक इलाज करने का दावा करने से नहीं चूकते। स्वास्थ्य विभाग इन पर शिकंजा कसने में नाकाम हैं। विभाग की आंखें तभी खुलती हैं, जब इन अस्पतालों में भर्ती किसी मरीज की जान जाती है और परिजन हंगामा करते हैं। मामला सुर्खियों में आने पर क्लीनिक के कागजात खंगाले जाते हैं और फिर कमियां बताकर सील कर दिया जाता है। कुछ दिनों बाद ही सब कुछ सामान्य हो जाता है। एक-दो नहीं, ऐसे कई उदाहरण हैं। तेजी से बढ़ते अवैध अस्पतालों की संख्या विभागीय जिम्मेदारों के कार्यप्रणाली की पोल खोल रही है।
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