कभी जिस कांग्रेस का डंका बजता था। वह अब अपने वजूद की जंग लड़ रही है। इस बार के चुनाव में भी कांग्रेस खाता नहीं खोल पाई। पिछले तीन दशक के दौरान हुए चुनाव में जिले की राजनीति में कांग्रेस के हाथ जीत नहीं लगी है। इस बार भी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जीत को तरस गई। प्रियंका गांधी वाड्रा की घोषणा भी काम नहीं आई।
आजादी के बाद वर्ष 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में राबर्ट्सगंज और दुद्धी से कांग्रेस को जीत मिली थी। उस समय सोनभद्र अविभाजित मिर्जापुर का हिस्सा था। अविभाजीत मिर्जापुर रहते जितनी बार चुनाव हुए यहां की जनता ने कांग्रेस के हाथ को उतनी बार साथ दिया। वर्ष 1984 के चुनाव में जीत हासिल करके कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। कांग्रेस की सरकार बनी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने चार मार्च 1989 को मिर्जापुर से अलग सोनभद्र जनपद की घोषणा की थी। उस समय बतौर सांसद रामप्यारे पनिका और विधायक कल्लूराम रत्नाकर रहे। जनपद विभाजन के बार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव हुए लेकिन कांग्रेस के हाथ को जनता का साथ नहीं मिला।
वर्ष 2012 में विजय सिंह गोंड को कांग्रेस ने टिकट दिया था लेकिन वह चुनाव नहीं लड़ सके थे। इस पर अपना समर्थन रूबी प्रसाद को दे दिया था। हालांकि रूबी प्रसाद निर्दल विधायक चुनी गईं। वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को जनता ने नकार दिया। 2022 के इस चुनाव में कांग्रेस ने खूब दमखम दिखाया। राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी ने नारा दिया लड़की हूं लड़ सकती हूं और महिलाओं को भी चुनावी मैदान में उतारा। लेकिन उनका यह प्रयास भी काम नहीं आया। बृहस्पतिवार को हुए मतगणना में कांग्रेस का एक भी प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा पाया। जिले में कांग्रेस तीन दशक से वजूद की लड़ाई लड़ रही है लेकिन उनके हाथ को जनता साथ नहीं दे रही है।
काम न आई प्रियंका की घोषणा
इस बार के चुनाव की कमान कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा संभाली थी। उन्होंने महिलाओं को लुभाने के लिए लड़की हूं लड़ सकती हूं... का नारा देते हुए 40 प्रतिशत सीटें देने की घोषणा की थीं। इसी घोषणा पर अमल भी किया और जिले की चार में से दो विधानसभा सीट पर महिला प्रत्याशियों को चुनावी मैदान में उतारीं। घोरावल से विंदेश्वरी सिंह राठौर, राबर्ट्सगंज से कमलेश ओझा, ओबरा से रामराज व दुद्धी से बसंती पनिका चुनाव मैदान में थीं लेकिन इस बार भी जिले में कांग्रेस का खाता नहीं खुला।
2017 में गठबंधन के बाद भी जीत नहीं
वर्ष 2017 के चुनाव में सपा और कांग्रेस ने प्रदेश में गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। इसके बावजूद गठबंधन के प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था। उस समय भी जिले की चारों विधानसभा सीट पर भाजपा और अपना दल गठबंधन के प्रत्याशियों को जीत मिली थी।