ओबरा। वर्ष 2000 में विखंडित रेलवे के बाद सबसे ज्यादा कर्मचारियों वाले उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद के पुनर्गठन की मांग पुन: शुरू हो गई है। विद्युत संयुक्त संघर्ष समिति इसको लेकर पुन: आन्दोलन का रुख कर सकती है। इसे लेकर बीते सोमवार को विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति उप्र की लखनऊ में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया कि यदि बिजली कर्मचारियों व अभियन्ताओं की न्यायोचित समस्याओं का द्विपक्षीय वार्ता द्वारा समाधान न किया गया तो सभी ऊर्जा निगमों के तमाम बिजली कर्मचारी व अभियंता अगले सप्ताह प्रदेशव्यापी आंदोलन की घोषणा करने को बाध्य होंगे।
विद्युत परिषद के विखंडन पर तत्कालीन सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया था कि विघटन के बाद सभी उर्जा निगम व्यवसायिक तरीके से चलाए जाएंगे। जिससे यह निगम घाटे से उभरकर लाभ की इकाई बन जाएंगे। बिजली अधिकारियों कर्मचारियों ने सरकार के इस कदम का यह कह कर विरोध किया था कि यूपी सरकार के प्रदेश की जनता के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व निभाते हुए ऊर्जा निगमों को व्यवसायिक तरीके से चलाया जाना असंभव होगा। बिजली कर्मियों के तर्कों के आधार पर 25 जनवरी 2000 को बिजली कर्मियों के साथ हुए समझौते में यूपी सरकार ने विघटन के एक वर्ष बाद इसकी समीक्षा करने व राज्य विद्युत परिषद के पुनर्गठन करने का लिखित आश्वासन दिया था। बताते चलें कि 14 जनवरी 2000 को उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद को चार भागों में विखंडित कर दिया गया था। उस समय परिषद के 450 करोड़ के घाटे को इसका प्रमुख कारण बताया गया था। लेकिन वर्ष 1999.2000 में जो घाटा करीब 450 करोड़ रुपये का था, वह अब बढ़कर सालाना 12 हजार करोड़ पार हो गया है। यही नही वितरण कंपनियों का सकल घाटा और कर्ज करीब 60 हजार करोड रुपये से अधिक हो गया है। कालांतर में इनके और छोटे-छोटे टुकड़े कर नौ निगम बना दिए गए। जिसमे उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन, पांच डिस्कॉम, एक पारेषण निगम, विद्युत उत्पादन के दो अलग-अलग निगम उत्पादन निगम लिमिटेड तथा उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड शामिल हैं।
संघर्ष समिति की ये हैं प्रमुख मांगें
ओबरा। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने ऊर्जा सचिव और ऊर्जा निगमों के अध्यक्ष को पूर्व में पत्र सौंपा है। इसमें मांग किया है कि उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत परिषद निगम लि. का गठन किया जाए। आगरा फ्रेन्चाइजी, ग्रेटर नोएडा का निजीकरण, पारेषण में किया गया निजीकरण और विद्युत वितरण में राजस्व वसूली, ई सुविधा, मीटर आदि के नाम पर की जा रही निजीकरण की प्रक्रिया को पूरी तरह से निरस्त किया जाए। इसी तरह से कई अन्य मांगें भी उठाई गई हैं। इसमें वर्ष 2000 के बाद भर्ती हुए सभी कार्मिकों के लिए पुरानी पेंशन प्रणाली लागू की जाये एवं पुरानी पेंशन प्रणाली लागू होने तक एनपीएस की तरह सीपीएफ में भी नियोजक का अंशदान 14 प्रतिशत तत्काल किया जाये शामिल हैं।
विफल हुई नीतियां- अदालत वर्मा
ओबरा। अभियंता संघ के क्षेत्रीय सचिव इं. अदालत वर्मा ने कहा कि दरअसल सुधार के नाम पर किए गए सभी प्रयोगों की यह नीति पूर्ण रूप से विफल हो चुकी है। वर्ष 2000 में विघटन के समय लगभग 60 लाख उपभोक्ता और एक लाख कर्मचारी थे। अब 1.80 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता हैं और उसपर मात्र 40 हजार कर्मचारी बचे हैं। बिजली उपकेंद्र ठेके पर चल रहे हैं। मीटर रीडिंग, बिलिंग, राजस्व वसूली और बिजली देने का कार्य निजी कंपनियों एवं ठेकेदार के संविदा कर्मचारी कर रहे हैं। तमाम निगम बनाने से जहां एक और प्रशासनिक खर्चे बढ़ रहे हैं वही तीनों निगमों में समन्वय की भी समस्या बढ़ती जा रही है।