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कहीं टूटी सड़कें, कहीं पगडंडी ही बनी है सहारा

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सोनभद्र। केंद्र और राज्य दोनों के खजाने को भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जिले में कई गांव ऐसे हैं, जहां सड़क, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। कई गांवों में रपटे, सड़क, पुलिया आदि क्षतिग्रस्त हैं। कहीं टूटी सड़कें तो कहीं पगडंडी ही आवागमन का सहारा है। हर चुनाव में बिजली-पानी और सड़कों को मुद्दा बनाया जाता है। इनके विकास के वादे भी किए जाते रहे हैं लेकिन आज तक पूरे नहीं हुए। विंढगमंज इलाके के 25 से अधिक गांवों को रीवा-रांची राजमार्ग से जोड़ने वाली प्रधानमंत्री सड़क इस कदर टूटी हुई कि ग्रामीण सड़क की बजाय पटरी से चलना बेहतर समझते हैं। ग्रामीणों के काफी मनुहार के बाद सात वर्ष पूर्व इसका नवीनीकरण हुआ था लेकिन घटिया सामग्री के इस्तेमाल की वजह से कुछ समय बाद ही सड़क छतिग्रस्त हो गई। 2017 के विधानसभा चुनाव में मूड़ीसेमर, पटेल नगर, मेदनीखांड़, धूमा, छतरपुर, सुखड़ा, गोइठा, हरपुरा, बैरखड़, बरखोरहा आदि गांवों के लोगों ने इसे मुद्दा भी बनाया, बावजूद हालात नहीं बदले। इसके चलते महज 12 किमी की दूरी तय करने में दो घंटे लग जाते हैं। धूमा प्रधान, रामप्रसाद यादव और मूड़ीसेमर के मिथिलेश कुमार कहते हैं तहसील दिवस को साथ सांसद से कई बार गुहार लगाई गई लेकिन नतीजा नहीं निकला। इससे ग्रामीणों को विंढमगंज पीएचसी पहुंचने में काफी परेशानी होती है। रेणुकूट के मुर्धवा ग्राम सभा के धौकीनाला बस्ती में आवागमन का सहारा पगडंडी है। ग्रामीणों ने विधानसभा चुनाव में इसको लेकर नाराजगी जताने के साथ कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। क्षेत्र पंचायत सदस्य अजय राय, सुदेश्वर यादव, बजरंगी, नंदकिशोर यादव, हीरालाल यादव, बाबूलाल, वीरेंद्र, नंदकिशोर जायसवाल, राजेश, प्रमिला देवी मनबसिया, मनकुंवर देवी का कहना है कि इस बस्ती में बिजली भी नहीं पहुंची। सरकारी योजनाओं से भी यहां अधिकांश लोग वंचित है। बारिश के समय बस्ती मुख्य धारा से कट जाती है। मलेरिया-दिमागी बुखार से हर साल यहां तीन से चार मौतें होती हैं।
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पैदल चलने में भी लगता है डर
ओबरा: ओबरा से सीधे सलईबनवा रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए लगभग सात वर्ष पूर्व बने मार्ग की सुध नहीं ली जा रही है। लोहियाकुंड पठार श्रृंखला के बीच से गुजरने वाला यह मार्ग निर्माण के बाद पहली बरसात में ही बहना शुरू हो गया था। सलईबनवा से तेलगुड़वा के लिए जाने वाली यह सड़क आधी से अधिक खत्म हो चुकी है। परमिला देवी और उर्मिला कहती हैं कि सड़क की बजाय, जंगल के रास्ते जाना ज्यादा सुगम है। इस रास्ते पर पैदल चलने में भी डर लगता है।

एडवेंचर का एहसास कराता है शिल्पी-रिजुल मार्ग
घोरावल: कोलियाघाट-शिल्पी और कोलियाघाट रिजुल मार्ग एडवेंजर का एहसास कराता है। करीब तीन किमी लंबी इस पहाड़ी सड़क के निर्माण की कई बार आवाज उठी लेकिन तकनीकी दिक्कत बता पल्ला झाड़ लिया गया। जबकि दोनों मार्ग अंतर्राज्यीय महत्व के हैं। इन मार्गों से चोपन ब्लाक के साथ ही मध्य प्रदेश के कई गांवों का आवागमन होता है। घाटी होने के कारण कोलियाघाट से जुड़े इस रास्ते पर वाहन चलाना या यात्रा करना एडवेंचर से कम नहीं होता। आए दिन इस पर दुर्घटनाएं होती रहती हैं। हरिगोविंद पांडेय, दीनबंधु बैसवार, रामानंद पांडेय, रामभजन पटेल, धनंजय पटेल, मंगरू यादव आदि का कहना था कि सड़क न बनने से हमारी जिंदगी काले पानी की सजा जैसी हो गई है।
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500 मीटर की बजाय पांच किमी दूरी तय करना मजबूरी
बभनी: पोखा, मचबंधवा संपर्क मार्ग पर बनी पुलिया तीन वर्ष पूर्व से टूटी पड़ी है। बारिश में बही इस पुलिया के निर्माण को लेकर कोई पहल नहीं हुई। इससे सड़क, बाजार, इलाज, शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रमों में जाने वालों को दिक्कत का सामना तो करना ही पड़ता है। पोखरा से चैनपुर की दूरी महज पांच सौ मीटर है लेकिन पुलिया टूटने के कारण चैनपुर पहुंचने के लिए पांच किमी दूरी तय करना मजबूरी है। श्याम गुप्ता, रामजी, रामप्रसाद, श्यामसुंदर, विश्वनाथ, ओमप्रकाश, रमेश कुमार का कहना है कि जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों से गुहार लगाई गई लेकिन पुलिया का निर्माण नहीं हो सका। इसी तरह चपकी-नधिरा मार्ग की हालत जर्जर है।

कोड़ार बस्ती के लिए सड़क का ख्वाब अधूरा
अनपरा: ग्राम सभा सिरसोती के टोला कोड़ार में आजादी के 72 वर्ष बाद भी सड़क स्वप्र बनी हुई है। छत्तीसगढ़ से सटे एक हजार की आबादी वाले टोले में आवागमन पगडंडी के सहारे होता है। हर चुनाव में यह मुद्दा उठता है लेकिन यहां के लोगों को कोई राहत नहीं मिली, इसके चलते यहां के लोग इस बार लोकसभा चुनाव के बहिष्कार को लेकर लामबंद होने लगे हैं। वैनी: दुपटिया से अमिला धाम संपर्क मार्ग की स्थिति काफी बदतर है। दोपहिया वाहन सवार जान जोखिम में डालकर इस रास्ते आवागमन करते हैं। इस रास्ते पैदल आवागमन ज्यादातर ग्रामीणों की मजबूरी है। 15 किमी लंबी इस सड़क की खस्ताहाली के कारण लोगों को 20 से 25 किमी अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है।
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