सीतापुर। जिले में ब्लॉक प्रमुख के चुनाव में प्रत्याशियों को टिकट देने में भाजपा से कहीं न कहीं चूक हुई है। जी हां, ये सुनकर आपका चौंकना लाजिमी है, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है। आप सोच रहे होंगे कि जिले की 15 सीटों पर भगवा परचम फहराने वाली पार्टी से ऐसी क्या चूक हुई तो आइए आपको बताते हैं।
अगर दो और प्रत्याशियों को टिकट मिल जाता तो 15 नहीं बल्कि जिले की 17 सीटों पर भगवा परचम फहरा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। यही वजह है कि चुनावी नतीजे आने के बाद अब पार्टी में अंदरखाने इस बात की समीक्षा और चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। बात कर रहें सिधौली से सपा के टिकट पर ब्लॉक प्रमुखी का चुनाव लड़ने वाले रामबख्श रावत और कसमंडा से चुनाव लड़ीं निर्दलीय प्रत्याशी मुन्नी देवी की।
इन दोनों प्रत्याशियों ने न सिर्फ ब्लॉक प्रमुख का चुनाव बड़ी मजबूती से बड़ा बल्कि जीतकर भाजपा को बड़ा झटका भी दिया है। सिधौली से रामबख्श रावत और कसमंडा से मुन्नी देवी दोनों ही प्रत्याशी भाजपा से ब्लॉक प्रमुखी का टिकट मांग रहीं थी, लेकिन पार्टी के जिम्मेदारों ने सियासी समीकरणों का हवाला देते हुए इन दोनों प्रत्याशियों को यहां से टिकट नहीं दिया।
इन दोनों प्रत्याशियों की जगह भाजपा ने सिधौली से रोहित भारती और कसमंडा से गुड्डी देवी को टिकट दे दिया था, इससे रामबख्श रावत और मुन्नी देवी बगावत पर उतर गईं। रामबख्श रावत ने सपा का दामन थाम लिया। समाजवादी पार्टी ने इन्हें टिकट दे दिया, जबकि मुन्नी देवी निर्दलीय ही चुनावी मैदान में कूद गईं।
नामांकन के दिन चुनावी माहौल खराब करने को लेकर कमसंडा ब्लॉक में जो कुछ भी वह, वह किसी से छिपा नहीं है, लेकिन गोली, हथगोले चलने के बाद भी मुन्नी देवी नामांकन करने में कामयाब हुई। 10 जुलाई को ब्लॉक प्रमुख का चुनाव हुआ, जिसमें कसमंडा से निर्दलीय प्रत्याशी मुन्नी देवी, सिधौली से सपा प्रत्याशी रामबख्श रावत की जीत हुई और इन सीटों पर चुनाव लड़े भाजपा के दोनों प्रत्याशियों को मुंह की खानी पड़ी, जबकि चुनाव में चार सीटों पर भाजपा की विजय हुई।
पहले 11 ब्लॉकों में निर्विरोध चुनाव कराने में कामयाब रही भाजपा की झोली में इस तरह से 15 सीटें गईं। एक मायने में भाजपा की यह बड़ी जीत है, लेकिन सियासी जानकारों और पार्टी के ही कुछ लोगों की माने तो टिकट बंटवारे में अगर थोड़ा और मंथन किया गया होता, कसमंडा और सिधौली टिकट मांग रहे रामबख्श रावत, मुन्नी देवी को टिकट मिल जाता तो आज तस्वीर कुछ और ही होती। फिर 15 नहीं बल्कि 17 सीटों पर भगवा का कब्जा होता।
इन दोनों सीटों पर मिली हार के बाद पार्टी के जिम्मेदार भले ही अब खुलकर टिकट बंटवारे में हुई चूक को नहीं मान रहे हों, लेकिन अंदरखाने इसकी सुगबुगाहट तेज हो गई है। सार्वजनिक तौर पर न सही, लेकिन पार्टी में इस बात पर चिंतन जरूर हो रहा है कि अगर इन दोनों सीटों पर रामबख्श रावत और मुन्नी देवी को ही उतारा जाता तो तस्वीर और भी बेेहतर होती। ऐसे में दो सीटें गंवाने के पीछे कहीं न कहीं पार्टी से टिकट देने में चूक एक बड़ी वजह मानी जा रही है।
जीत रहीं सीटों को गवां दिया
जीत के जश्न के साथ जीत रहीं इन सीटों को गवांने वाली भाजपा को इससे भी सबक और सीख लेने की जरूरत है, तभी 2022 में आगामी विधानसभा के चुनाव में जिले से यूपी फतह का मिशन कामयाब हो सकेगा। पार्टी में भी ये बात उठी हैं। जानकारों की माने तो पार्टी ने इससे सबक लिया भी है। टिकट बंटवारे में सियासत के हर रंग को परखने की जरूरत है।
रामबख्श ने 2017 में लड़ा था विधानसभा का चुनाव
भाजपा प्रत्याशी को मात देकर ब्लॉक प्रमुख की सीट पर काबिज हुए रामबख्श रावत की क्षेत्र में अच्छी पकड़ मानी जा रही है। यही वजह है कि भाजपा के प्रत्याशी को हराकर प्रमुख की सीट पर कब्जा जमाने में वह कामयाब रहे। 2017 में रामबख्श रावत ने भाजपा के टिकट से विधानसभा का चुुुनाव लड़ा था, लेकिन जीत नसीब नहीं हो सकी थी। बसपा के टिकट पर हरगोविंद भार्गव ने विधायक का चुनाव जीता था। चुनाव हारने के बाद भी रामबख्श रावत भाजपा से जुड़े रहे। ब्लॉक प्रमुख के चुनाव का टिकट मांग रहे थे, लेकिन टिकट न मिलने पर सपा के सिंबल पर चुनाव लड़े।