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छिन गया रोजगार, सपने हुए तार-तार

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सीतापुर/सिधौली। किसी ने घर की छत डलवाने तो कोई बेटे की शादी का सपना संजोए हुए था। भाई का इलाज कराने तो बच्चों का अच्छे स्कूल में दाखिले का ख्वाब सजाकर किसी ने कमाई के मकसद से परदेश का रुख किया था। जिले के तमाम मजदूर और कामगार अपने सपनों में रंग भरने के लिए परिवार से सैकड़ों मील दूर कमाने गए थे। कोरोना महामारी ने देश में पैर पसारने शुरू कर दिए तो लॉकडाउन होने से इनका रोजगार छिन गया। कमाई रहने-खाने में खर्च हो गई। मजबूरन इन्हें टूटे सपनों की टीस मन में लेकर खाली हाथ घर वापस लौटना पड़ा। सपनों को साकार करना तो दूर अब इन्हें परिवार का पालन-पोषण करने की चिंता सता रही है। घर लौटे मजदूरों की दुश्वारियां फिलहाल खत्म होती नजर नहीं आ रही हैं।
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टूटा घर की छत डलवाने का सपना
पिता की कमाई में परिवार का गुजारा बमुश्किल हो पाता है। गांव में किसी तरह घर बनवा लिया मगर छत नहीं पड़ सकी है। परिवार में सबसे बड़ी होने के नाते सोचा, मैं भी कमाने लगूं तो छत डलवा लूंगी। इसलिए हरियाणा के गुडगांव की एक फैक्टरी में नौकरी कर ली। जिले के देवियापुर में रहने वाली अलका बताती हैं कि लॉकडाउन के बाद काम छिन गया। जितना कमाया वह इतने दिनों में खर्च हो गया। खाली हाथ घर लौटना पड़ा है। घर की छत डलवाने का सपना फिलहाल टूट गया।
शादी करने का ख्वाब रह गया अधूरा
पिता की मृत्यु के बाद परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी सोनू के कंधों पर आ गई। कमाने के लिए वह घर से सैकड़ों मील दूर हैदराबाद चला गया। कमाई अच्छी होने से परिवार का गुजारा आराम से चलने लगा। शादी की उम्र हुई तो रिश्ते आना शुरू हो गए। एक जगह बात भी बन गई। अब सोनू ने अपनी शादी के लिए पैसे जोड़ना शुरू कर दिया। इसी बीच लॉकडाउन होने से उसका रोजगार छिन गया। कुछ दिन लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार किया फिर मायूस होकर घर वापस लौट आया। सोनू कहता है कि अब परिवार पालने का संकट आ खड़ा हुआ है। शादी का सपना फिलहाल अधूरा ही रह गया।
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सपना रह गया अपना घर बनवाना
जिले के खरवलिया गांव में रहने वाला शंकर एक साल पहले घर बनवाने के लिए पंजाब कमाने गया था। पंजाब की एक फैक्टरी में काम मिलने पर शंकर को अपने घर का सपना सच होता नजर आने लगा। शंकर ने सोचा था कि कुछ पैसे जमा होेते ही गांव आकर घर बनवाना शुरू कर देगा। इसी बीच लॉकडाउन ने उसका रोजगार छीन लिया। लॉकडाउन खत्म होने के इंतजार में वहीं रुका रहा। रहने-खाने में जमापूंजी भी खत्म होने लगी। लिहाजा, शंकर वापस लौट आया। शंकर बताता है कि घर बनवाने का सपना अब पूरा होता नजर नहीं आ रहा है।
अब कैसे होगा भाई का इलाज
पिता का देहांत होने पर नदीम ने परिवार के पालन-पोषण की जिम्मेदारी बखूबी उठा ली। कुछ दिन गुजरते ही भाई इब्राहिम बीमार हो गया। डॉक्टरों ने कहा इलाज लंबा चलेगा। अधिक पैसों की जरूरत होने पर नदीम दिल्ली चला गया। दिल्ली में रेडीमेड कपड़ों की सिलाई का काम मिला तो अच्छी कमाई होने लगी। इसी बीच लॉकडाउन होेने से काम मिलना बंद हो गया। जमापूंजी रहने-खाने में खर्च हो गई तो गुजारे के लिए उधार लेना पड़ा। लिहाजा, नदीम ने घर वापस लौटने में ही भलाई समझी। अब हर वक्त उसे भाई के इलाज की चिंता सताती रहती है।
कर्जदार होकर लौटा तो ईद की खुशियां हुई काफूर
बच्चे बड़े होने लगे तो उन्हें अच्छी तालीम के साथ बेहतर जिंदगी देने के लिए अली अहमद ने पंजाब का रुख किया। पटियाला में जरदोजी का काम मिला तो उसने पैसे जोड़ना शुरू कर दिया। इस बार ईद पर घर आने का सोच रखा था। ईद से पहले वह लौट तो आया लेकिन खाली हाथ। अली अहमद ने बताया लॉकडाउन के बाद कमाई खर्च हो गई। वापस आने के लिए उधार लेना पड़ा। अच्छे स्कूल में बच्चों का दाखिला तो दूर ईद की खुशियां भी काफूर हो गईं।
बेटे की शादी को जुटाए पैसे भी हुए खर्च
सिधौली के मोहल्ला संतनगर में रहने वाले खलील ने ईद के बाद अपने बेटे की शादी करने का सपना संजोया था। इसके लिए खलील दिल्ली में काम करने चले गए। खलील वहां जितना भी कमाते ज्यादा से ज्यादा बेटे जिब्राइल की शादी के लिए बचा रहे थे। इसी बीच कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए लॉकडाउन होने से कमाई बंद हो गई। जोड़कर रखे हुए पैसे भी धीरे-धीरे खर्च हो गए। किसी तरह घर लौटे खलील ने बताया कि बेटे की शादी का सपना अब साकार होता नजर नहीं आ रहा है।
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