सीतापुर। लालबाग स्थित पड़ाव में एक ड्रेस की दुकान पर दोपहर करीब दो बजे अभिभावकों की भीड़ लगी थी। इस बीच अमर उजाला की टीम पहुंचती है। कई लोग बच्चों की ड्रेेसों को खरीदने में मशगूल थे। एक महिला ड्रेस खरीद चुकी थी। दुकानदार ने पैसे जोड़कर बताए तो महिला चौंकी। बोली... अरे भैया क्या बता रहे हो? थोड़ी रियायत कर लो। बहुत महंगी ड्रेस दे रहो हो। पिछले साल खरीदी थी, तब इतनी महंगी नहीं थी। एक साल में ही एक ड्रेस पर तीन से चार सौ रुपये की महंगे हो गए।
महिला की बात सुनकर ड्रेस खरीद रहे अन्य लोग भी उसकी हां में हां मिलाने लगे। दुकानदार ने सभी की बातें सुनी, फिर बोला की अरे बहन जी... महंगाई सिर्फ ड्रेस पर ही नहीं हर चीज पर बढ़ गई है। मैं क्या करूं। रॉ मैटेरियल ही महंगा आ रहा है तो दाम भी बढ़ने स्वाभाविक हैं। दुकानदार की बातें सुनने के बाद अभिभावक भी मजबूर हुए। आखिर में सभी लोग ड्रेस लेकर रवाना हो गए।
इसके बाद टीम लालबाग बाजार स्थित भूसा मंडी पहुंची। वहां भी हालात जुदा नहीं थे। जूते पर भी महंगाई का असर था। बच्चों के पैर का साइज मापने के बाद पैसे देते समय अभिभावकों और दुकानदारों के बीच बातचीत ड्रेस की दुकान पर होने वाली वार्तालाप की तरह ही चल रही थी। यहां दुकानदार ने बताया कि जीएसटी की दरें बढ़ने से जूतों पर महंगाई दिख रही है। दो प्रतिशत जीएसटी की दरें बढ़ गई हैं, इससे जूते महंगे हो गए हैं। काफी देर तक बातचीत का सिलसिला यूं ही जारी रहा। आखिर में अभिभावक पैसों का भुगतान कर चले गए।
अभिभावकों के चले जाने के बाद अमर उजाला की टीम ने दुकानदारों से बातचीत की। उन्होंने बताया कि महंगाई बढ़ी है। इसी वजह से जब सामान महंगा मिल रहा है तो बिकेगा भी महंगा, लेकिन इस तरह की बातचीत रोज ही होती है। अब कम लोग ही ड्रेस और जूते लेने आ रहे हैं। स्कूल खुले काफी दिन बीत चुके हैं। इसलिए अधिकतर अभिभावकों ने खरीदारी कर ली है।
ऐसे समझें बढ़ी हुईं कीमतें
एक दुकानदार ने बताया कि जिस शर्ट का एक मीटर कपड़ा पिछली बार 80 रुपये में आता था, वह इस बार 120 रुपये का मिल रहा है। इसी तरह पैंट के कपड़े का हाल है। रॉ मटेरियल की बात करें तो धागा, चैन, बटन, हुक पर दाम बढ़ गए हैं। अब बाहर से रॉ मटेरियल महंगा आ रहा है कपड़े को सिलने के बाद महंगे दामों पर बेचना दुकानदार अपनी मजबूरी बता रहे हैं। जूतों की बात करें तो जो जूता पिछली बार छोटे बच्चों के लिए 150 का मिलता था, वह अब 250 से 300 रुपये तक मिल रहा है। यही नहीं कुछ जूते तो 450 से 500 रुपये की कीमत के छोटे-छोटे मिल रहे हैं।
हर स्कूल की ड्रेस की अलग कीमत
ड्रेेसों के मामलों में भी कहीं न कहीं खेल हो रहा है। बच्चे भले ही छोटी बड़ी क्लास के हों, लेकिन अगर स्कूल अलग-अलग है तो उनकी ड्रेसों के रेट में काफी अंतर है। हालांकि, संबंधित स्कूलों की ड्रेसों की बिक्री करने वाले लोगों का कहना है कि सभी के कपड़े में अंतर है। इसलिए पैसों में फर्क है।
आसमान छू रहे दाम
कोरोना काल के बाद ऐसा लगता है कि जैसे पढ़ाई पर एक दम से महंगाई छा गई हो। चाहे कॉपी-किताब ले लीजिए या ड्रेस, जूता-मोजा। इन सबके दाम तो आसमान छू रहे हैं। पिछले साल ली गई बच्चे की यूूनिफॉर्म अब काफी महंगी हो गई।
- उपासना श्रीवास्तव, अभिभावक
कॉपी-किताब भी महंगी खरीदी
प्राइवेट स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई मध्यम वर्ग के परिवार के लिए काफी मुश्किल हो गई है। कॉपी किताब से लेकर बच्चों की यूनिफॉर्म तक महंगी हो गई है। अब अभिभावक बच्चे की कॉपी-किताब लें या फिर महंगी ड्रेस खरीदें।
- आरती विश्वकर्मा, अभिभावक
पढ़ाई भी हुई महंगी
पिछले साल बच्चे की यूनिफॉर्म खरीदी थी। तब सस्ती थी, इस साल तो एक दम से दो सौ रुपये बढ़ गए हैं। इससे लगता है कि सारी महंगाई बच्चों की पढ़ाई पर ही आ गई है। दुकानदार रटा-रटाया जवाब देते हैं कि रॉ मटेरियल महंगा हो गया है।
- पूजा भंडारी, अभिभावक
ड्रेस महंगी पर लेना भी जरूरी
प्राइवेेट स्कूलों का हाल न पूछिए। एक तो इतनी महंगी फीस, इसके अलावा महंगी कॉपी-किताबें। अब यूनिफॉर्म में भी महंगाई की आग लग गई है। बच्चों की ड्रेस लेना गया था, लेकिन दाम सुनकर ही वापस घर लौट गया। फिर वापस जाकर महंगी ड्रेस लेनी पड़ी।
- मोनू शुक्ला, अभिभावक
पहली बार इतनी महंगाई देखी
बेटा अभी फर्स्ट क्लास में है। पहले जो जूते 150 रुपये में मिल गए थे, इस बार 260 रुपये चुकाने पड़े। दुकानदार ने बताया कि इस बार जीएसटी का रेट बढ़ गया है। इस वजह से जूते महंगे हो गए हैं। इतनी महंगाई पहली बार देेेखी है।
- वसीम, अभिभावक
स्कूल भी कर रहे मनमानी
कान्वेंट स्कूलों की मनमानी बढ़ती जा रही है। अगर जिम्मेदारों ने ध्यान नहीं दिया तो इनकी तानाशाही चलती ही रहेगी। इन स्कूलों के बताए ही जगह पर कॉपी-किताब और ड्रेस खरीदिए। भले वह चाहे जितनी महंगी क्यों न दें।
- मुकुल, अभिभावक