नैमिषारण्य। तीर्थ नगरी स्थित कालीपीठ में चल रहे श्रीमद्भागवत महाकुंभ में मराठी भाषा में श्रीमद्भागवत और हिंदी में रामकथा का आयोजन किया जा रहा है। महाकुंभ के दूसरे दिन मंगलवार को मुंबई से आईं मराठी कथा वाचिका धनश्री लेले ने श्रीमद्भागवत कथा के महात्म्य, भगवान श्रीकृष्ण-सुदामा की मित्रता और राजा परीक्षित की कथा का मनभावन वर्णन करते हुए कहा कि संकट के समय सच्चा मित्र बिना किसी स्वार्थ के सबसे पहले खड़ा होता है। कालीपीठाधीश्वर गोपाल शास्त्री इस भागवत महाकुंभ के मुख्य संकल्पी हैं।
कथा व्यास ने कृष्ण-सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सच्ची मित्रता में धन-दौलत, पद और प्रतिष्ठा का कोई महत्व नहीं होता। भगवान श्रीकृष्ण द्वारिकाधीश होने के बावजूद बालसखा सुदामा को देखते ही भावुक हो गए और उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया। सुदामा के मन में भगवान के प्रति अटूट प्रेम और श्रद्धा थी। उन्होंने कहा कि संकट के समय सच्चा मित्र बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़ा रहता है। श्रीकृष्ण ने भी सुदामा की परिस्थितियों को देखकर बिना मांगे ही उनका जीवन बदल दिया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को जीवन की अनिश्चितता को समझते हुए अच्छे कर्म, ईश्वर भक्ति और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। श्रीमद्भागवत कथा केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का माध्यम है। कथा से बुराइयों का त्याग, अच्छाइयों को अपनाने, सत्संग करने और सनातन धर्म-संस्कृति के संस्कारों का पालन करने की प्रेरणा मिलती है। महाकुंभ के दूसरे सत्र में डॉ. चारूदत्त आफले ने श्रद्धालुओं को श्रीराम कथा का रसास्वादन कराते हुए कहा कि भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेकर भी अंततः उन्हें अपनी कृपा प्रदान करते हैं। श्रीराम का जीवन आज भी समाज को मर्यादा और आदर्श जीवन की प्रेरणा देता है।