-फाइनेंस कंपनियां के एजेंटों ने फेरी लगाकर कम दर पर ब्याज देने की बात कहकर फंसाया, अब कर रहे उत्पीड़न
-घर पर उत्पीड़न से भागकर मायके पहुंची, तो वहां भी देने लगे धमकी
-बांसी कोतवाली क्षेत्र के गोनहा गांव में कई पीड़ित महिलाओं ने बयां की उत्पीड़न की कहानी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर/ सकारपार। आर्थिक समस्या से जूझ रहे परिवारों को उससे उबरने का ख्वाब उन्हें और बर्बाद कर रहा है। आसानी और साप्ताहिक किस्त में फंसकर लोन लेने वाले फाइनेंस कंपनियों के उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं। जड़ जमा चुके फाइनेंस कंपनी के एजेंटों पर कार्रवाई के नाम पर कोई शिकंजा नहीं कसा जा रहा है।
प्रशासन स्वत: संज्ञान में ले नहीं रहा है और कर्ज में डूबे गरीब परिवार के लोग कानूनी दांव पेंच के डर से कार्रवाई के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। कर्ज में डूबी महिलाओं से बात की गई तो चौंकाने वाला सच सामने आया। यहां महिलाओं ने बताया कि कर्ज की रकम के लिए उत्पीड़न किया जा रहा है। इससे तंग आकर मायके चली गईं तो वहां भी लेनदार पहुंच जा रहे हैं। वहां गाली गलौज करते हैं। फाइनेंस कंपनियों द्वारा दी गई कर्ज की रकम के अनुसार एक सप्ताह, पंद्रह दिन एवं पच्चीस दिन पर किस्त जमा करने की बात एजेंट समझाते हैं, लेकिन अगर किस्त देने की तिथि से एक दिन भी अधिक हुआ तो एजेंट पूरी शक्ति के साथ वसूली करने में लग जाते हैं।
बांसी कोतवाली क्षेत्र के बांसी-धानी मार्ग स्थित गोनहा ताल पूर्वी गांव में कई गरीब महिलाएं फाइनेंस कंपनियों के मकड़जाल में फंसकर कर्जदार हो गई हैं। कर्ज चुकाने के लिए गरीब महिलाएं अपने जेवरात तक बेच दे रही हैं। फिर भी कर्ज नहीं चुका पाईं, तो खेत रेहन रख देना पड़ा। फाइनेंस कंपनी के कर्ज में फंसी महिलाओं से बातचीत में यह बात सामने आई।
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कर्जदार बनीं महिलाओं ने बयां की दास्तां
बांसी कोतवाली क्षेत्र के बांसी-धानी मार्ग स्थित गोनहा ताल पूर्वी की कर्ज से पीड़ित महिला गुड़िया पत्नी सुरेश ने बताया कि गांव में माइक्रो फाइनेंस कंपनी के एजेंट घूमते रहते हैं। एक दिन हमारे घर पर फाइनेंस कंपनी का एक एजेंट आया और हमें बहला-फुसलाकर 20 हजार रुपये लोन दिला दिया, जिसको चुकाने के चक्कर में दूसरे माइक्रो फाइनेंस कंपनी का 50 हजार कर्ज हो जाना पड़ा। कर्ज देते समय एजेंट इतनी नर्मी से बात करते हैं कि लगता है इससे बड़ा हितैशी कोई नहीं है, लेकिन जैसे ही किस्त जमा करने की तारीख से एक दिन अधिक होता है तो एजेंट दरवाजे पर आकर ऊटपटांग बकने लगते हैं। कहते हैं कि अगर किस्त जमा करने की तारीख से एक दिन भी ज्यादा हुआ तो प्रतिदिन पांच सौ रुपये के हिसाब से जुर्माना भरना पड़ेगा। इसी डर से अपने पास मात्र 15 मंडी खेत था, वह भी गिरवी रख दिया, लेकिन फिर भी कर्ज चुकता नहीं हो पाया। अब एजेंट बार-बार घर पर आकर प्रताड़ित करते हैं। वहीं, गांव की पीड़ित महिला सरिता गिरी पत्नी दिनेश ने बताया कि गांव में माइक्रो फाइनेंस कंपनी के एजेंटों का मकड़जाल फैला है। हमको कुछ रुपये की जरूरत थी, इधर-उधर परेशान थे। उसी बीच हमारे घर फाइनेंस कंपनी का एक एजेंट आया और लोन के बारे में समझाने लगा। उसने मीठी-मीठी बातों के जाल में फंसाकर हमें फाइनेंस कंपनी से 20 हजार रुपये कर्ज दिला दिया। उसने कहा कि पंद्रह दिन पर आठ सौ रुपये जमा करते रहना, आसानी से अदा हो जाएगा, लेकिन जैसे ही किस्त जमा करने की तिथि से एक दिन भी अधिक होता था, एजेंट दरवाजे पर पहुंच कर अपशब्द का प्रयोग करते हुए ऊटपटांग बातें करने लगता था, जिसके डर से पति घर छोड़कर बाहर चले गए। हम बच्चों को लेकर मायके चले गए। तो एजेंट मायके भी पहुंच कर मुझे हड़काते। कहते थे कि अगर समय से पैसा जमा नहीं करोगी तो मैं तुम सबको जेल भेजवा दूंगा। इसके डर से दूसरी जगह से कर्ज लेकर फाइनेंस कंपनी का कर्ज चुकता करना पड़ा। दूसरी जगह के कर्ज की अभी भी भरपाई नहीं हो सकी।
गांव की रेखा निषाद पत्नी शिवकुमार भी एजेंटों के जाल में फंस कर माइक्रो फाइनेंस कंपनी से 50 हजार कर्ज ले लिया। पच्चीस दिन पर 2720 रुपये किस्त देनी पड़ती थी। घर की माली हालत भी ठीक नहीं। घर पर पति ही कमाने वाले हैं, जो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। वहीं चार छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिनका पालन-पोषण करना चुनौती से कम नहीं है। हर पच्चीस दिन पर 2720 रुपये किस्त देना भारी पड़ रहा था। इधर एजेंट दरवाजे पर पहुंचकर उल्टा सीधा बोलते थे। उनके डर से घर छोड़कर इधर-उधर भागना पड़ता था। गहने बेचने के बाद भी कर्ज चुकता नहीं हुआ। तो पुनः दूसरी माइक्रो फाइनेंस कंपनी से 60 हजार रुपये कर्ज लेकर पहले का कर्ज को चुकता कर दिया, लेकिन पुनः कर्जदार हो गई। अब चिंता के मारे रात दिन नींद नहीं आती है।
वहीं, गांव की सरिता निषाद पत्नी सोनू माइक्रो फाइनेंस कंपनी के एजेंट के जाल में फंस कर 30 हजार की कर्जदार हो गईं। सरिता ने बताया कि मुझे कुछ पैसों की जरूरत थी। पता नहीं कैसे एजेंट को पता चला तो वह दौड़ दौड़कर घर आने लगा, और मीठी-मीठी बात बोलकर खूब समझाने लगा। मुझे भी पैसों की जरूरत थी तो उसकी बातों में फंस कर 30 हजार कर्ज ले लिया। उसके बाद हर सप्ताह सात सौ रुपये किस्त देनी पड़ती थी। अगर किस्त जमा करने में सात दिन से एक दिन भी अधिक हो जाता, तो एजेंट घर आकर उल्टा-सीधा बोलने लगता था। कहता कि पांच सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगेगा।
एजेंट की प्रताड़ना से आजिज आकर कभी-कभी घर छोड़ देना पड़ता था। एजेंट इतनी गंदी हरकत करते थे कि दरवाजे पर चढ़कर उल्टा-सीधा बोलते। पति भी ठीक से नहीं कमा पाते, क्योंकि कुछ दिन पहले उनका हाथ कट गया था। इससे घर की माली हालत खराब हो चुकी है। खेत रेहन हो गया फिर भी कर्ज नहीं चुका, तो दूसरी जगह से 45 हजार रुपये कर्ज लेकर 30 हजार रुपये जमा किया, लेकिन पुनः कर्जदार हो गई।
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गांव के व्यक्ति के जरिए जानते हैं, माली हालत
गांव वालों को कर्ज दिलाने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि लोन बांटने वालों का एक रैकेट होता है। इनका अलग- अलग एरिया बंटा रहता है। यह लोग गांव में आने के बाद किसी एक व्यक्ति से संपर्क साधते हैं। इसके बाद गांव के गरीब परिवार जिनकी माली हालत खराब हो और जो मजदूरी करते हों, उन्हें फंसाते हैं। उनके घर उठना बैठना, मदद की बात करना और फिर लोन की बात शुरू होती है। इसके बाद लोन देने की बात शुरू होती है। गांव के एक आदमी को पहले कमीशन की लालच देकर फंसाते हैं। उसके बाद वह आदमी अपने गांव के लोगों को बहला-फुसलाकर कर ले जाता है। अधिकतर एजेंट द्वारा औरतों पर ही डोरे डाला जाता है। जब एक बार लोग फंस जाते हैं। तो उस कंपनी के मकड़जाल में फंस कर रह जाते है। अंत में महिलाओं को घर के जेवरात बेचने के साथ खेतों को रेहन तक रख देना पड़ता है। अंत में घर छोड़कर भागना भी पड़ता है।
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बोले विधि विशेषज्ञ
जनपद में फाइनेंस कंपनी के उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसमें गांव के गरीब लोग फंसकर कंगाल हो जा रहे हैं। आभूषण, खेत तक बेचने और गिरवी रखने को विवश हो रहे हैं। इसमें प्रशासन की ओर से स्वत: संज्ञान में लेकर कार्रवाई की जानी चाहिए। एडीएम राजस्व एवं वित्त की ओर से जनपद में पंजीकृत कितने हैं और कितना मानक है। इसकी जांच करवाकर कार्रवाई की जानी चाहिए। किसी के शिकायती पत्र देने की जरूरत नहीं है।
-संजय कुमार श्रीवास्तव, अधिवक्ता