संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। नदी में कोई डूबता है तो सबसे पहले पानी में उसके अपने उतरते हैं। गांव के तैराक कपड़े उतारकर नदी में छलांग लगा देते हैं। चीख-पुकार के बीच हर गुजरता मिनट जिंदगी पर भारी है। शुरुआत के पांच मिनट अहम होते हैं लेकिन व्यवस्था होते घंटों बीत जाते हैं। ऐसे में जिले में भी ऐसी व्यवस्था की दरकार है, जिससे तत्काल राहत मिल सके।
बानगंगा नदी में तीन किशोरों के डूबने का मामला हो या इसके बाद की अन्य घटनाएं, लगभग हर जगह शुरुआती घंटों तक स्थानीय तैराक और गोताखोर ही तलाश करते रहे। विशेषज्ञ बचाव दल बाद में पहुंचा।
छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. सीबी चौधरी बताते हैं कि डूबने के बाद शुरुआती कुछ मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसी दौरान व्यक्ति को पानी से बाहर निकालकर सांस बहाल करने और तत्काल चिकित्सा सहायता मिलने पर उसके जीवित बचने की संभावना सबसे अधिक रहती है। समय बीतने के साथ ऑक्सीजन की कमी मस्तिष्क और अन्य अंगों को प्रभावित करने लगती है। दुनिया भर में जल-रेस्क्यू व्यवस्था का पूरा ढांचा “गोल्डन मिनट्स” पर आधारित होता है।
जिले में हर मानसून में डूबने की घटनाएं होती हैं। संवेदनशील घाटों पर न तो प्रशिक्षित लाइफगार्ड हैं औश्र न स्थानीय जल-रेस्क्यू पोस्ट। वहां ऐसे उपकरण भी नहीं हैं, जिनसे शुरुआती बचाव किया जा सके।