शहर में वाटर सप्लाई के पास फैली हुई गंदगी। संवाद
सिद्धार्थनगर। शहर में शुद्ध पानी की समस्या गंभीर होती जा रही है। किसी दिन इंदौर जैसा हादसा न हो जाए, इसकी संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता। नगर पालिका क्षेत्र में जल निगम की टूटी पाइप लाइन से पहुंच रहा पानी कभी भी बीमार बना सकता है। कई लोग पानी का जार मंगवा कर इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन उन्हें भी शुद्ध पानी मिल रहा है इसकी कोई गारंटी नहीं है।
ग्राउंड रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अधिकांश आरओ प्लांट बोरिंग के पानी पर आधारित हैं। इस पानी में फ्लोराइड, आयरन, आर्सेनिक, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे तत्वों की मात्रा कितनी है, इसकी जांच तक नहीं कराई जा रही।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक मानक विहीन पानी का असर तुरंत नहीं दिखता। यह धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। फिजीशियन डॉ. गौरव दुबे बताते हैं कि उनके पास पहुंचने वाले मरीजों में जल जनित बीमारियों के मरीज काफी हैं। उनमें कई ऐसे हैं जो जार का पानी पी रहे थे।
500 पीपीएम तक होना चाहिए टीडीएस: वनस्पति विज्ञानी डॉ. शिवेंद्र मोहन पांडेय ने बताया कि शुद्ध पानी में टीडीएस की मात्रा 500 पीपीएम (पार्ट्स प्रति मिलियन) होनी चाहिए। इसका पीएच लेवल 7.0 से 8.5 के बीच होना चाहिए। इससे ज्यादा होने पर यह नुकसानदेह है। निजी आरओ से आपूर्ति किए जाने वाले पानी में टीडीएस और पीएच की नियमित जांच होनी चाहिए। पानी में अशुद्धता से लोग त्वचा रोग, पथरी, हेपेटाइटिस या पीलिया, हैजा, पोलियो, टायफाइड, डायरिया आदि के शिकार हो सकते हैं।