जिला पशु चिकित्सालय में गिद्धराज का इलाज करते पशुधन प्रसार अधिकारी अरुण कुमार प्रजापति। संवाद
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सिद्धार्थनगर। हिमालय की तलहटी से सटे तराई क्षेत्र से लेकर अयोध्या तक दुर्लभ प्रजाति के गिद्धों की गतिविधि देखी जा रही है। मगर, मौसम की मार से वह भी परेशान हैं। चिंताजनक बात यह है कि जितने में गिद्ध पाए जा रहे हैं, सभी बेहाल गिरे मिल रहे हैं।
सिद्धार्थनगर के पकड़ी गांव के पास शुक्रवार को भी एक गिद्ध गिरा पाया गया। आसमान की ऊंचाइयों को छूने वाले जटायु के भीगे पंख और उनका वजन तराई की ठंड में जवाब दे जा रहे हैं, जिससे आए दिन वह घायल हो गए हैं।
सिद्धार्थनगर के पकड़ी गांव के पास शुक्रवार को कुछ ग्रामीणों ने गिद्ध को गिरा देखा तो इसकी सूचना वन विभाग को दी। सूचना पर पहुंचे क्षेत्र के वन रक्षक निखिल श्रीवास्तव उसे लेकर पशु चिकित्सालय पहुंचे। उसके पंख भीगे हुए थे और मौसम का असर उसपर साफ नजर आ रहा था। पशुधन प्रसार अधिकारी अरुण कुमार प्रजापति ने उसका इलाज किया और आग जलाकर उसके पंख सुखाने का प्रयास किया।
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. जेपी शुक्ल बताते हैं कि गिद्ध ज्यादा ठंड को रेजिस्टेंट नहीं कर पाते। ठंड और भूख से थके तराई की ओर रुख तो कर रहे हैं, लेकिन यहां भी 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे तापमान और कोहरे को वे झेल नहीं पा रहे हैं।
वन्यजीव प्रेमियों और जानकारों का कहना है कि पूर्वी यूपी में दिखाई देने वाले ज्यादातर गिद्ध अब स्वस्थ नहीं हैं। वे या तो कुपोषित दिखते हैं या फिर उड़ान भरने की क्षमता खो चुके हैं। कई बार वे पेड़ों पर बैठे तो दिखते हैं, लेकिन जरा सी हलचल पर संतुलन खो देते हैं।
पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश श्रीवास्तव बताते हैं कि हाल के महीनों में पूर्वी यूपी के तराई क्षेत्र से लेकर अयोध्या तक गिद्धों की आवाजाही बढ़ी है।
आसमान में उनकी मौजूदगी पहली नजर में सुखद लगती है, लेकिन जमीन पर तस्वीर इसके ठीक उलट है। ज्यादातर गिद्ध या तो कमजोर हालत में दिख रहे हैं या फिर सीधे बदहाली में गिरे मिल रहे हैं।