- बीमार गिद्ध से मिली नई सीख, 20 दिन में समझा जटायु का मिजाज
- 20 दिन की देखरेख में दर्ज हुआ हिमालयन ग्रिफन का पूरा व्यवहार
- तराई में बढ़ती मौजूदगी के बीच गिद्धों की सेहत पर शुरू हुआ मंथन
सिद्धार्थनगर। हिमालयन ग्रिफन गिद्ध का हाल ही में किए गए 20 दिन के इलाज ने पक्षी विशेषज्ञों को इस दुर्लभ प्रजाति के मिजाज और व्यवहार को गहराई से समझने का अवसर दिया। पक्षी विशेषज्ञों ने पाया कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण गिद्ध कई बार मौसम की मार का शिकार हो रहा है। इस दौरान गिद्ध की ऊर्जा और प्रतिरोधक क्षमता पर ठंड और लंबी उड़ान का सबसे ज्यादा असर पड़ा। कमजोर इम्युनिटी के चलते गिद्ध संक्रमण और थकान का शिकार हो रहा था।
खेसरहा रेंज के वन क्षेत्राधिकारी सुशील कुमार बताते हैं कि बीमार अवस्था में पाए जाने से लेकर स्वस्थ होकर खुले आसमान में छोड़े जाने तक गिद्ध का हर व्यवहार और प्रतिक्रिया बारीकी से दर्ज की गई। विशेषज्ञों ने देखा कि गिद्ध का मिजाज परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहा। ठंड के दिनों में वह सुस्त और थका हुआ नजर आता था जबकि इलाज और सुरक्षित आहार मिलने पर उसकी गतिविधियां धीरे-धीरे बढ़ीं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि गिद्ध मृत पशुओं पर निर्भर रहते हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में शव खुला नहीं छोड़ा जाता, जिससे गिद्ध आहार के अभाव में कमजोर पड़ जाते हैं। प्रतिबंध के बावजूद कुछ दर्दनाशक दवाओं का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे गिद्धों में किडनी संबंधी जोखिम बढ़ जाता है। पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि 20 दिन के इस अवलोकन से गिद्धों के मिजाज, स्वास्थ्य और अनुकूलन क्षमता को समझने में मदद मिली है, जो हिमालयी तराई क्षेत्र में संरक्षण रणनीतियों के लिए अहम होगा।
वन क्षेत्राधिकारी ने बताया कि दो जनवरी को बीमार मिलने से लेकर स्वस्थ होकर खुले आसमान में छोड़े जाने तक गिद्ध में आने वाले हर बदलाव पर बारीकी से नजर रखी गई। शरीर का तापमान, आहार, गतिविधियां और प्रतिक्रिया जैसी हर पहलू को दर्ज कर पूरा डेटा संकलित किया गया जो आगे संरक्षण रणनीति में मददगार होगा।
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संरक्षण के प्रयासों को मिल रही परवाज
- गिद्ध संरक्षण को लेकर सरकार और वन विभाग स्तर पर भी प्रयास तेज किए गए हैं। उत्तराखंड और नेपाल के बीच कॉर्बेट से कतर्नियाघाट तक फैले करीब 30 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसी कड़ी में महाराजगंज (फरेंदा) में दुनिया का पहला एशियाई राजा गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र स्थापित किया गया है। इसके अलावा तराई के कई गांवों में गिद्ध रेस्तरां संचालित किए जा रहे हैं, जहां डाइक्लोफेनाक मुक्त मांस उपलब्ध कराकर सुरक्षित भोजन सुनिश्चित किया जा रहा है।
कोट.....
-हम चाहते हैं कि प्राकृतिक सफाई कर्मी कहे जाने वाले ये गिद्ध सुरक्षित और पर्याप्त भोजन के साथ स्थायी रूप से यहां रह सकें। इसके लिए गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र और संरक्षण केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं ताकि स्थानीय वन्यजीव प्रेमियों और वन अधिकारियों के सहयोग से यह क्षेत्र गिद्धों के लिए आदर्श स्थल बन सके।
- नीला एम. डीएफओ- सिद्धार्थनगर