शोहरतगढ़ कस्बे में बना शाहिद बुधईराम स्मारक। संवाद
शोहरतगढ़। चौरीचौरा जन विद्रोह के बाद अंग्रेजों का दमन चक्र चला तो नेपाल सीमा से सटा शोहरतगढ़ व क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आंदोलन को धारदार बनाने में जुटे थे, वहीं ब्रिटिश हुकूमत उन पर कोड़े बरसा रही थी। आजादी के आंदोलन में कई बार जेल जा चुके बुधईराम व पंडित परमेश्वरदत्त सहित दो दोस्त इस यातना में शहीद हो गए थे।
इस बर्बरता दमन के बाद महात्मा गांधी ने नवजीवन लिखा था कि खलीलाबाद के बाद शोहरतगढ़ की जनता ने शांति से चौरी चौरा का उत्तर दिया है। सेनानियों की तरफ से हिंसा हुई थी या नहीं, यह पता करने महात्मा गांधी के पुत्र देवदास गांधी शोहरतगढ़ भी आए थे। यहां अंग्रेजी हुकूमत की पुलिस ने उनके साथ भी अभद्रता की थी। बस्ती गजेटियर में भी दमन का उल्लेख है। जंग-ए-आजादी की पहली मशाल मई 1857 के आखिरी हफ्ते में जल चुकी थी। इस मशाल को जलाए रखने में शोहरतगढ़ भी पीछे नहीं था। 1857 से लेकर 1922 तक ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध आंदोलन किए गए। स्वतंत्रता संग्राम में भारत माता के कई सपूत ने अपना बलिदान दिया था।
चार फरवरी 1922 को चौरी चौरा जनविद्रोह के बाद ब्रिटिश हुकूमत दमन पर उतर आई थी। अखिल भारतीय कांग्रेस के कार्यालयों और सेनानियों की निगरानी होने लगी थी। 29 अप्रैल में 1922 को शोहरतगढ़ कस्बा स्थित कांग्रेस कार्यालय पर 100-150 कार्यकर्ता आंदोलन की रूपरेखा बना रहे। अंग्रेज अधिकारियों ने पुलिस के साथ छापेमारी की और कार्यालय में आग लगा दी।
कार्यकर्ताओं पर कोड़े बरसाने लगी। इसमें आंबेडकर नगर के बुधईराम पुत्र गजाधर घोड़ों की टापों के नीचे आकर शहीद हो गए, शोहरतगढ़ के धरमसिंहवा के परमेश्वर दत्त पांडेय पुत्र रामचरन कोड़े खाकर बेहोश हो गए।