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Siddharthnagar News: प्रतिबंध के बावजूद चोरी-छिपे खूब बिकता है चीनी मांझा

Fri, 06 Feb 2026 11:39 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
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सिद्धार्थनगर। अगर आपका बच्चा या परिवार का कोई सदस्य पतंग का शौकीन है तो सतर्क हो जाएं, क्योंकि अब चीनी मांझे से होने वाली मौत पर हत्या की प्राथमिकी दर्ज होगी। ऐसा सीएम योगी ने प्रदेश में चीनी मांझा से होने वाली मौत और हादसे को देखते हुए फरमान जारी किया है।
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जनपद में चोरी-छिपे चीनी मांझे की बिक्री हो रही है। मकर संक्रांति पर कुछ बच्चों के हाथ में जख्म हुए तो परिवार के लोगों ने कारण जानने की कोशिश की पता चला कि पतंग के धागे से कटा है। यह चीनी मांझा हो सकता है।
मुख्यालय से लेकर तहसील मुख्यालय के बाजार और कस्बों में चीनी मांझे की बिक्री जारी है। इसे सामान्य मांझा कहकर दुकानदार बेचते हैं। मांझा की आपूर्ति के बारे में जानकारी ली गई तो इसके दो चैनल सामने आए। सीमावर्ती इलाके में नेपाल से चोरी-छिपे चीनी मांझे की तस्करी होती है। इसके बाद इस चीनी मांझे को सिद्धार्थनगर और अन्य जिलों में छोटी-छोटी खेप में भेजा जाता है।
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सूत्रों के मुताबिक लखनऊ, बस्ती और फैजाबाद तक चीनी मांझे की सप्लाई की जाती है। वहीं, दूसरा सबसे बड़ा नेटवर्क दिल्ली का सदर बाजार बताया जा रहा है। स्टेशनरी का काम करने वाले दुकानदारों ने बताया कि दिल्ली के सदर बाजार से खिलौनों के साथ चीनी मांझे आते हैं। चुनिंदा दुकानदार ऑर्डर देकर मांगते हैं और बेचते हैं, क्योंकि यह बहुत महंगा आता है।
हालांकि सीएम के फरमान का असर जिले में दिखने लगा है। नेपाल बॉर्डर पर स्थित अलीगढ़वा कस्बे में दुकानों पर चीनी मांझे को लेकर पुलिस ने चेकिंग अभियान चलाया।
तस्करी के लिए बदनाम है नेपाल बॉर्डर: नेपाल से लगने वाली जिले की 68 किलोमीटर सीमा पूरी तरह से खुली है और तस्करों के लिए यह मुफीद मानी जाती है। चांदी से लेकर मादक पदार्थ और खाद्यान्न व खाद की तस्करी आम है। चीन निर्मित मांझा से होने वाली मौत को देखते हुए 2016 में कोर्ट और फिर सरकार ने इस पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन जैसे ही मकर संक्रांति पर्व आता है, चीनी मांझे की तस्करी बढ़ जाती है। भले ही स्थानीय स्तर पर किसी बड़ी बरामदगी की पुष्टि न हुई हो, लेकिन जानकारों का कहना है कि चीनी मांझे की तस्करी छोटे-छोटे खेपों में होती है, जिससे पुलिस और प्रशासन की नजर से बचना आसान हो जाता है।
सूत्रों के मुताबिक यह मांझा नेपाल बॉर्डर पार कर पहले ग्रामीण इलाकों में पहुंचता है, फिर वहां से कस्बों और शहर के बाजारों तक सप्लाई किया जाता है। दुकानदार इसे सामान्य मांझे के नाम पर या छिपाकर बेचते हैं, ताकि कार्रवाई से बचा जा सके।
वहीं बॉर्डर इलाके के रहने वाले इम्तियाज ने बताया कि स्थानीय लोगों की जुबानी यह धागा नहीं धार है। ग्राहक इसी मांझे की डिमांड करते हैं। इनकी कीमत 40 रुपये में 100 ग्राम से 100 रुपये के 100 ग्राम तक में बिकती है। यानी 400 से 1000 रुपये किलो बिकती है। यह चीनी मांझा दुकानदार को लगभग आधे दाम पर मिलता है। खुनुवां बॉर्डर के पास एक दुकानदार ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया कि डिमांड होने पर चोरी-छिपे यह मांझा लाया जाता है, क्योंकि त्योहारों और मकर संक्रांति के आसपास इसकी मांग अचानक बढ़ जाती है।
15 जनवरी से शुरू होकर अप्रैल तक बिक्री होती है। इससे अच्छी कमाई हो जाती है। वहीं, कुछ लोगों ने बताया कि इस मांझे को दिल्ली, गुजरात और राजस्थान जैसे बड़े शहरों से उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी लाया जाता है, लेकिन नेपाल से भी इसकी तस्करी होती है। तस्कर 68 किलोमीटर का खुले बॉर्डर से मांझा की तस्करी कर बढ़नी, कोटिया, खुनुवा, पकडीहवा, बजहा, कपिलवस्तु और ककरहवा के सीमाई इलाकों से भारत में लाते हैं।
2016 में लगा था प्रतिबंध, फिर भी नहीं रुका धंधा : साल 2016 में चीनी मांझे पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था, क्योंकि यह न केवल इंसानों बल्कि पक्षियों और पशुओं के लिए भी बेहद खतरनाक साबित हो रहा था। इसके बावजूद हर साल पतंगबाजी के मौसम में यह मांझा किसी न किसी रूप में बाजारों में दिखाई देने लगता है। यह स्थिति साफ इशारा करती है कि प्रतिबंध के बावजूद निगरानी और कार्रवाई में कहीं न कहीं ढील है।
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