कपिलवस्तु क्षेत्र में स्थित मझौली सागर।
सिद्धार्थनगर। जिले की प्राकृतिक धरोहर मझौली सागर जैव विविधता का केंद्र है। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक अध्ययन में यहां 306 प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इसमें पौधों की 145, 122 प्रजातियों के पक्षी और 39 मछलियों की प्रजातियां दर्ज की गईं।
विश्वविद्यालय ने इसके संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय पहचान के लिए मझौली सागर को रामसर साइट के रूप में विकसित करने की दिशा में पहल शुरू की है।
विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आशुतोष कुमार वर्मा के नेतृत्व में शोधार्थी अनामिका सिंह और हर्षित सिंह ने मझौली सागर का विस्तृत अध्ययन किया। सालभर जल संचयन रहने के कारण यहां विशिष्ट जलीय और स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र विकसित हुआ है। अध्ययन में सामने आया कि जलाशय में वर्षभर पानी रहने से विभिन्न प्रजातियों के लिए अनुकूल वातावरण बना रहता है। इससे यह क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाता है।
डॉ. वर्मा के अनुसार अध्ययन में मझौली सागर को केवल जलाशय के तौर पर नहीं देखा गया बल्कि इसके पूरे पारिस्थितिक तंत्र का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया।
यहां मौजूद वनस्पतियां जलाशय के आसपास के पर्यावरण को प्रभावित करती हैं जबकि पक्षियों और मछलियों के लिए यह क्षेत्र भोजन और आवास उपलब्ध कराता है। इस तरह विभिन्न जीवों के बीच पारिस्थितिक संतुलन बना हुआ है।
रामसर दर्जे से संरक्षण को मिलेगी मजबूती : मझौली सागर को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में विकसित करने के लिए विश्वविद्यालय ने रामसर इंफॉर्मेशन शीट (आरआईएस) और विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया है। इसे कुलसचिव डॉ. अश्वनी कुमार के माध्यम से जिलाधिकारी को सौंपा गया।
विश्वविद्यालय का मानना है कि रामसर साइट के रूप में पहचान मिलने से मझौली सागर के संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और प्रबंधन को नई दिशा मिल सकती है। प्रस्ताव सौंपने के दौरान डॉ. आशुतोष कुमार श्रीवास्तव, डॉ. अंकित, डॉ. आशुतोष कुमार वर्मा और शोध-अध्ययन दल के सदस्य मौजूद रहे।