सिद्धार्थनगर। पश्चिमी एशिया में बढ़ते संघर्ष के बीच जिले में रसोई गैस की किल्लत लगातार गहराती जा रही है। लोगों के मन में यह बात घर करती जा रही है कि आने वाले दिनों में स्थिति और खराब हो सकती है। ऐसे में सिलिंडर लेने के लिए लोग पूरी जोर-आजमाइश में लगे हुए हैं।
आपूर्ति और वितरण व्यवस्था पर असर पड़ने से घरों की रसोई से लेकर होटल-ढाबों, मैरिज हॉल, हॉस्टल, जेल और स्कूलों में बनने वाले मध्याह्न भोजन भोजन तक संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि लोग अब लकड़ी के चूल्हे, कोयले की भट्ठी और इंडक्शन जैसे विकल्पों का सहारा लेने लगे हैं, लेकिन इनकी कीमतों में भी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।
जिले में कुल 37 गैस एजेंसियों के माध्यम से 6 लाख 35 हजार 666 घरेलू गैस कनेक्शन संचालित हैं। शुक्रवार को 8820 कनेक्शनों पर गैस सिलिंडर की आपूर्ति की गई थी, जबकि शनिवार को 13,800 सिलिंडर वितरित करने की योजना बनाई गई है। इसके बावजूद मांग और आपूर्ति के बीच अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे समस्या विकराल रूप लेती जा रही है।
गैस की किल्लत का असर बाजार में भी देखने को मिल रहा है। सामान्य दिनों में 110 से 120 रुपये प्रति किलो के हिसाब से मिलने वाली गैस इस समय कालाबाजारी में 180 से 200 रुपये प्रति किलो तक बेची जा रही है। प्रशासन ने ऐसे मामलों पर सख्ती के संकेत दिए हैं और एजेंसियों की निगरानी बढ़ा दी गई है।
रसोई गैस की कमी का असर सबसे अधिक उन संस्थानों पर पड़ने लगा है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। स्कूलों में मध्याह्न भोजन, हॉस्टलों की मेस और मैरिज हॉल के संचालन में भी दिक्कतें सामने आने लगी हैं।
मध्याह्न भोजन पर संकट, सिर्फ एक दिन का सिलिंडर : बिस्कोहर। घरेलू गैस सिलिंडर की बुकिंग में 25 दिन की वेटिंग के कारण परिषदीय स्कूलों में बनने वाले मध्याह्न भोजन पर भी संकट खड़ा हो गया है। कई स्कूलों में गैस खत्म होने के बाद लकड़ी के चूल्हे पर भोजन बनाना पड़ रहा है। बिस्कोहर के प्राथमिक विद्यालय प्रथम के इंचार्ज अभयंकर सिंह ने बताया कि स्कूल में दो-तीन दिन की गैस ही बची है।
सामान्य तौर पर एक सिलिंडर 10 से 12 दिन चलता है।प्राथमिक विद्यालय द्वितीय के इंचार्ज धर्मेंद्र कुमार के अनुसार स्कूल में पांच-छह दिन की गैस शेष है। यदि तब तक नया सिलिंडर नहीं मिला तो लकड़ी के चूल्हे पर भोजन बनाना पड़ेगा। वहीं अशोक नगर संग्रामपुर स्थित कंपोजिट विद्यालय में सिलिंडर खत्म होने के बाद रसोइयों ने ईंट का चूल्हा बनाकर लकड़ी और सूखे पत्तों से भोजन तैयार करना शुरू कर दिया।