- 2800 वर्ग किमी में सीमित संसाधनों से आग से जंग की तैयारी, हर साल हजारों हेक्टेयर गेहूं की फसल हो रही तबाह
- पांच तहसील मुख्यालय में दो जगह अभी है फायर स्टेशन की व्यवस्था
- गेहूं की फसल की कटाई शुरु होने के साथ ही बढ़ जाती है आग लगने की घटना
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। गर्मी की शुरुआत के साथ ही जिले में आगलगी का खतरा फिर गहराने लगा है। करीब 2800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और लगभग 30 लाख की आबादी वाले इस जनपद में आग से निपटने के लिए महज सात दमकल वाहन उपलब्ध हैं। इसमें भी चालकों की कमी के चलते कई बार गाड़ियां पुलिस और होमगार्ड के सहारे चलाई जाती हैं। ऐसे में अगर कहीं आग लगने की घटना होता है तो समय से काबू पाना बड़ी चुनौती होगा और बचना मुश्किल हो जाएगा।
इस समय जिले में 1.58 लाख हेक्टेयर में बोई गई गेहूं की फसल पक कर तैयार है। कटाई और मड़ाई के दौरान आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं, जिससे हर साल हजारों बीघा फसल जलकर नष्ट हो जाती है। हाल के दिनों में सामने आई आगलगी की घटनाओं ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। भौगोलिक दृष्टि से भी जिले में आग बुझाने की चुनौती बड़ी है। पूर्व में लोटन ब्लॉक से पश्चिम में भनवापुर तक और उत्तर में बढ़नी से दक्षिण में खेसरहा तक की दूरी 150 किलोमीटर से अधिक है। इतने बड़े क्षेत्र में सीमित संसाधनों के सहारे आग पर काबू पाना कठिन साबित होता है। आंकड़ों के अनुसार, जिले में हर साल 15 से 20 हजार हेक्टेयर तक गेहूं की फसल आग की भेंट चढ़ जाती है। वर्ष 2019 से 2025 तक के आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को दर्शाते हैं। इसके बावजूद संसाधनों में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी है।
हालांकि, अग्निशमन विभाग का दावा है कि फायर सीजन को देखते हुए सभी तहसीलों में टैंकर तैनात कर दिए गए हैं और लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है। प्रभारी अग्निशमन अधिकारी नसरूद्दीन खान के अनुसार, विभाग पूरी तरह तैयार है और जरूरत पड़ने पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संसाधनों और ढांचे को मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक हर साल आग से होने वाला नुकसान रोक पाना मुश्किल होगा।
सिर्फ दो तहसीलों पर फायर स्टेशन
- जिले की पांच तहसीलों में से केवल नौगढ़ और डुमरियागंज में ही फायर स्टेशन स्थापित हैं। बांसी, इटवा और शोहरतगढ़ में अब तक अग्निशमन केंद्र नहीं बन सके हैं। संसाधनों की बात करें तो विभाग के पास पांच बड़े और दो छोटे टैंकर हैं। बड़े टैंकर सभी तहसील मुख्यालयों पर तैनात किए गए हैं, जबकि छोटे टैंकर मुख्यालय और डुमरियागंज में लगाए गए हैं। मैनपावर की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। विभाग में चालकों के सात पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल तीन ही उपलब्ध हैं। अन्य कर्मियों की मदद से किसी तरह व्यवस्था चलाई जा रही है। ऐसे में एक साथ कई स्थानों पर आग लगने की स्थिति में सभी जगह समय से पहुंच पाना मुश्किल हो जाता है।
जिले में इतने रकबे पर होती है गेहूं की खेती
- आंकड़ों के मुताबिक जिले में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर भूमि पर गेहूं की खेती होती है। बात आग लगने और नुकसान होने की करें तो हर साल हजारों बीघा फसल आगे की भेंट चढ़ जाती है। वर्ष 2019 में 17 हजार हेक्टेयर, 2020 में 19 हजार हेक्टेयर, 2021 में 15 हजार हेक्टेयर, 2022 में 16 हजार व 2023 में 15 हजार, 2024 और 2025 में लगभग 20 हजार हेक्यटेयर क्षेत्रफल खड़ी गेहूं की फसल आग से जलकर होने का अनुमान रहा। इस वर्ष भी 1.58 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में गेहूं की फसल की बुवाई हुई है जो पक कर तैयार होने के कगार पर पहुंच गई है। फसल पकने के साथ ही किसानों की चिंता भी बढ़ रही है।
तीन तहसीलों में नहीं है संसाधन, कर्मियों की भी कमी
जिले के पांच तहसीलों में तीन तहसीलों बांसी, इटवा और शोहरतगढ़ में न तो अग्निशमन केंद्र है और न ही यहां पर आग बुझाने का कोई संसाधन है। सभी तहसीलों में अग्निशमन केंद्र स्थापित करने की योजना के तहत अब तक इन तीनों तहसीलों में भूमि उपलब्ध हो चुकी है। बांसी को छाेड़ इटवा व शोहरतगढ़ में निर्माण संबंधी प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है।
सीजन को देखते हुए पांच बड़े टैंकर हर पांच तहसील में एक-एक लगा दिया गया है। इसके अलावा डुमरियागंज और मुख्यालय में एक-एक छोटा टैंकर लगा है। कुल सात की संख्या है। विभाग की ओर से पूरी तैयारी है। लोगों को आग से बचाव के लिए भी जागरुक किया जाएगा।
- नसरूद्दीन खान, प्रभारी अग्निशमन अधिकारी