भारत नेपाल सीमा अलीगढ़वा में आवागन करते लोग।
सिद्धार्थनगर। नेपाल में निजाम बदलने के साथ नियमों पर अमल को लेकर सीमा पर बढ़ी सख्ती ने सीमावर्ती किसानों की चुनौती बढ़ा दी है। दुरुस्त कागजात के साथ खाद-बीज सीमा पार ले जाने में कस्टम ड्यूटी समेत अन्य शुल्क जेब पर भारी पड़ने लगे हैं।
सख्त निगरानी की वजह से जुगाड़ की आवाजाही में कार्रवाई का डर सता रहा है। सीमा पर बढ़ी सख्ती ने वर्षों से चली आ रही उस सीमावर्ती कृषि व्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, जिस पर हजारों परिवारों की खेती और बाजार दोनों टिके रहे हैं।
कभी भारत के साथ रोटी-बेटी के रिश्ते की पहचान रखने वाले नेपाल में सीमावर्ती इलाकों के तमाम भारतीयों के खेत-मकान भी हैं। नेपाल में खेती के लिए ये किसान सीमावर्ती बाजार से खाद-बीज ले जाते रहे हैं, वजह यह कि नेपाल में उपलब्ध खाद-बीज की गुणवत्ता पर कभी भरोसा नहीं रहा। वहीं नेपाल के किसान भी भारत आकर खरीदारी करते रहे हैं।
नेपाल के रूपनदेही, कपिलवस्तु और नवलपरासी आदि सीमावर्ती जिलों के किसानों का कहना है कि भारत-नेपाल की खुली सीमा के बावजूद धान का बीज और अन्य कृषि सामग्री अब ले जाना संभव नहीं रह गया है। हाल के दिनों में धान के कई क्विंटल बीज की बरामदगी और तस्करी की बढ़ती कोशिशों ने यह संकेत भी दिया है कि खेती की जरूरत और सीमा नियंत्रण के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। जानकारों का कहना है कि तराई में यह संकट अब सिर्फ बीज का नहीं रहा।
कपिलवस्तु के किसान हरिद्वार मनखोरिया बताते हैं कि दशकों से यहां का खेती तंत्र आपसी निर्भरता पर चलता रहा है। नेपाल के भइसकुंडा निवासी किसान दीप कुमार कहते हैं कि भारतीय बाजारों से धान का बीज, खाद और कीटनाशक खरीदकर नेपाल स्थित खेतों तक ले जाते रहे हैं। सीमावर्ती मंडियों और बाजारों की पूरी अर्थव्यवस्था भी इसी आवाजाही पर आधारित रही है। इन किसानों का कहना है कि अब धान या कोई अन्य बीज ले जाने पर कस्टम, जांच और अन्य औपचारिकताओं का दबाव बढ़ गया है। बिना कागजी प्रक्रिया पूरी किए बीज ले जाने पर कार्रवाई का खतरा है। ऐसे में किसान खेती का रकबा घटा रहे हैं। इस तरह सीमावर्ती बाजारों की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था भी सुस्त पड़ने लगी है। संवाद