सिद्धार्थनगर। शहर में डाकिया हनुमंत नगर के पते की चिट्ठी लेकर पहुंचता है तो पता उसे बड़गो का पूछना पड़ता है। ई-कॉमर्स कंपनी का डिलीवरी ब्वॉय गूगल पर परशुराम नगर की लोकेशन तलाशता रह जाता है और लोग उसे परसा महापात्र का रास्ता बताते हैं।
विस्तारित शहरी क्षेत्र के कुछ मोहल्लों में ये मुश्किलें रोज पेश आती हैं। दरअसल, शहर में शामिल किए गए कुछ गांवों के नाम कागजात में तरक्की पसंद नजरिये ने बदले तो कुछ के सियासी वजहों ने भी। जमीनी स्तर पर नए नाम स्थापित करने के इंतजाम न होने से इन मोहल्लों की पहचान नहीं बदली।
दरअसल, बदलते वक्त के साथ शहर का दायरा बढ़ा और तमाम गांव शहरी हो गए। गंवई आबोहवा में उपजे इन गांवों के नाम बदलकर इन्हें नया कलेवर देने की कवायद हुई। गोबरहवा गांव सरकारी कागजात में सिंघेश्वरीपुर के नाम से दर्ज हुआ तो थरौली को बाल्मीकि नगर कहा गया। शहर और गांव की बदलती सीमाओं के दौर में यहां के बाशिंदों के जेहन में अपनी मिट्टी की महक और पीढि़यों की स्मृतियां रची-बसी हैं। यही वजह है कि कागजात भले बदले हैं, जेहन से जुबां तक पुराना पता कायम है।
दिलचस्प बात यह है कि कई जगहों पर आज भी पुराने नाम वाले संकेतक लगे हुए हैं। कुछ मोहल्ले महापुरुषों के नाम पर किए गए लेकिन इलाके में उनकी मूर्ति तक नहीं। मधुकरपुर के प्रवेश द्वार पर लगा बोर्ड अब भी मधुकरपुर ही बताता है, जबकि वार्ड का आधिकारिक नाम पंडित दीनदयाल नगर है। परसा शाह आलम में भी बोर्ड पुराने नाम और रिकॉर्ड नई पहचान की तस्दीक करते हैं।
शहर में एक ही जगह की दो पहचान साथ-साथ चल रही हैं। सरकारी फाइलों, चुनावी दस्तावेजों और वार्ड सूची में नया नाम दिखाई देता है जबकि, स्थानीय बातचीत, दुकानों के पते और लोगों की जुबान पर पुराना नाम हैं। ऑनलाइन डिलीवरी एजेंट मोहित बताते हैं कि पंडित दीनदयाल नगर में सामान पहुंचाना था। गूगल मैप पर लोकेशन खोजने के बाद भी स्थानीय लोगों से रास्ता पूछना पड़ा। लोग मधुकरपुर के नाम से ही पहचानते हैं।