सिद्धार्थनगर। भीमापार, आजादनगर, सरोजनीनगर, पिठनी, गोबरहवा और बसडिलिया समेत शहर के कई निचले इलाकों में बारिश के दौरान जलभराव की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। जिन स्थानों पर कभी बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से निकल जाता था, वहां अब मकान, स्कूल, अस्पताल और व्यावसायिक भवन बन चुके हैं।
तालाबों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों के सिमटने और नालों की बदहाल व्यवस्था के कारण बारिश का पानी कई दिन तक सड़कों और गलियों में भरा रहता है।
करीब डेढ़ दशक पहले भीमापार के जिन हिस्सों में बरसात के दौरान पानी भरता था, वहां अब बड़े पैमाने पर निर्माण हो चुका है। इसी तरह आजादनगर और सरोजनीनगर का बारिश का पानी जिस तालाब और आसपास की निचली भूमि में पहुंचता था, वहां बहुमंजिला मकान बन गए हैं। नतीजतन इन मोहल्लों की पुरानी आबादी अब सबसे अधिक जलभराव की समस्या झेल रही है। सरोजनीनगर की निर्माणाधीन सड़क पर भी पानी और कीचड़ जमा है। बसडिलिया क्षेत्र में भी जलभराव वाली निचली जमीनों पर तेजी से प्लॉटिंग और भवन निर्माण हो रहा है। पानी भरने वाले क्षेत्रों में भी जमीन खरीदकर मकान बना रहे हैं। इसके लिए बड़े पैमाने पर मिट्टी डालकर जमीन ऊंची की जा रही है, जिससे जलनिकासी बाधित हो रही है। जमुआर नाले के किनारे भी बढ़ी बसावट : शहर के बीच से गुजरने वाले प्राकृतिक जमुआर नाले के किनारे स्थित निचले क्षेत्रों में भी तेजी से आबादी बढ़ी है। पहले पिठनी, गोबरहवा समेत कई मोहल्लों का बारिश का पानी इसी क्षेत्र में पहुंचता था लेकिन अब वहां भी बड़ी संख्या में मकान बन चुके हैं। इसके अलावा शहर के लगभग 50 छोटे-बड़े तालाब, पोखरे और गड्ढे कूड़ा डालकर या पाट दिए गए हैं, जिससे जल निकासी की प्राकृतिक व्यवस्था प्रभावित हुई है।