- भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय होने पर अंग्रेजों ने सतनारायन रूंगटा का मकान फूंक दिया था
- 19 अगस्त 1942 को गिरफ्तार कर बस्ती जेल में 30 सितंबर तक रखा गया, आज भी घर में सुरक्षित हैं आंदोलन से जुड़े दस्तावेज
शोहरतगढ़। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल बजा तो शोहरतगढ़ के सतनारायन रूंगटा भी आंदोलन में कूद पड़े। आजादी की लड़ाई में उनके तेवर इतने मुखर थे कि अंग्रेजी हुकूमत ने उनका मकान तक फूंक दिया। इसके बाद भी उनका हौसला नहीं टूटा। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद वह महीनों घर से दूर रहकर आंदोलन को धार देते रहे। अंग्रेजों ने 19 अगस्त 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर बस्ती जेल में नजरबंद कर दिया लेकिन जेल से बाहर आने के बाद भी आजादी की मुहिम से उनका नाता नहीं टूटा।
सतनारायन रूंगटा पुत्र जगन्नाथ रूंगटा के पूर्वज राजस्थान के झुनझुनू जिले के चिड़ावा तहसील के सुल्ताना कस्बे के निवासी थे। अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों से परेशान होकर परिवार शोहरतगढ़ आकर बस गया। यहां सतनारायन कांग्रेस की विचारधारा से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया तो सतनारायन ने जगह-जगह लोगों को आंदोलन के लिए जागरूक करना शुरू किया। उनके भाषणों का युवाओं पर असर पड़ने लगा। उनके बगावती तेवर अंग्रेजी हुकूमत को नागवार गुजरे और पुलिस ने उनका मकान फूंक दिया।
मकान जलाने के बाद भी सतनारायन पीछे नहीं हटे। चिल्हिया थाने की पुलिस ने उन्हें 19 अगस्त 1942 को गिरफ्तार किया। इसके बाद 30 सितंबर 1942 तक उन्हें बस्ती जेल में नजरबंद रखा गया। जेल से रिहा होने के बाद भी उन्होंने आजादी की लड़ाई जारी रखी। 16 मई 1979 को उनका निधन हुआ।
खाने के लाले पड़े, फिर भी नहीं टूटा आजादी का सपना
- आजादी का जुनून सतनारायन को घर-बार से दूर कर देता था। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण परिवार में कई बार खाने के लाले पड़ जाते थे। पत्नी रत्ना देवी और परिवार के अन्य सदस्यों की चिंता छोड़ वह महीनों तक आंदोलन में सक्रिय रहते थे। परिजन के अनुसार जब वह किसी रात घर लौटते तो उनके साथ कई अन्य आंदोलनकारी भी होते थे। ऐसे में रत्ना देवी को सभी के भोजन और बिस्तर का इंतजाम करना पड़ता था। मुश्किल हालात के बावजूद सतनारायन ने आजादी का सपना नहीं छोड़ा।
-
1940 की चिट्ठी आज भी परिवार के पास
- स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लिखी गई एक चिट्ठी आज भी रूंगटा परिवार ने सहेजकर रखी है। स्वतंत्रता सेनानी देशराज नारंग ने तीन फरवरी 1940 को सतनारायन रूंगटा को यह चिट्ठी लिखी थी। इसमें उन्होंने जरूरी कार्य से मिलने की बात कहते हुए उन्हें एक दिन के लिए साथ आने का आग्रह किया था। आंदोलन के दौर की यह चिट्ठी परिवार के लिए स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से कम नहीं है।
पेंशन लेने से भी कर दिया था इन्कार
- सतनारायन स्वाभिमानी थे। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन लेने से इन्कार कर दिया था। उनके निधन के बाद पत्नी रत्ना देवी को पेंशन देने की बात चली तो उन्होंने भी साफ मना कर दिया। परिजन के अनुसार उन्होंने बेटों से कहा था कि पति देश के लिए बलिदान हो गए, यदि दो वक्त की रोटी खिलाने में सक्षम नहीं हो तो बता दें। बेटों के साथ देने पर उन्होंने पेंशन लेने के बजाय उसे गरीबों को देने की बात कही।
-
नेहरू के शोहरतगढ़ आने की यादें भी सहेजे है परिवार
- परिवार के अनुसार सितंबर 1946 में पंडित जवाहर लाल नेहरू शोहरतगढ़ में आयोजित जनसभा में आए थे। कार्यक्रम में बस्ती के तीन लोगों के साथ सतनारायन रूंगटा भी मंच पर मौजूद थे। सभा के बाद नेहरू के सतनारायन के घर पहुंचने की बात परिवार बताता है। परिजन के अनुसार नेहरू ने उन्हें चांदी की चार तश्तरियां भेंट की थीं। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े संस्मरणों के साथ परिवार आज भी इन यादों को सहेजे हुए है।
परिवार की मदद के लिए विधायक ने लिखा था पत्र
- सतनारायन के बेटे शंकर प्रसाद रूंगटा की आर्थिक स्थिति खराब होने पर उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ के महामंत्री और विधायक पंचानन राय ने सात दिसंबर 1990 को राजस्व मंत्री को पत्र लिखा था। पत्र में उन्होंने शंकर प्रसाद की खराब आर्थिक स्थिति का उल्लेख करते हुए दोहनी की ग्राम समाज की खाली भूमि में से पर्याप्त भूमि उनके नाम आवंटित करने का अनुरोध किया था। सतनारायन के बेटे शंकर प्रसाद और रामचंद्र थे। शंकर प्रसाद के बेटे गोपी रूंगटा और राजेंद्र रूंगटा नीलू बताते हैं कि पिता और बाबा से सुनी स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियां आज भी परिवार को गौरवान्वित करती हैं। आंदोलनकारियों से जुड़ी चिट्ठियां और अन्य निशानियां घर में सुरक्षित हैं और परिवार के लिए यह विरासत आज भी आजादी के संघर्ष की याद दिलाती है।