औराताल। धान की फसल की कटाई के साथ-साथ गेहूं की फसल की बुवाई भी चल रही है। कृषि विभाग ने किसानों को पांच बिंदुओं का ध्यान रखने की सलाह दी है ताकि कम लागत में अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सके।
कृषि विज्ञान केंद्र सोहना के वैज्ञानिक डॉक्टर मारकंडेय सिंह ने बताया कि यदि किसान गेहूं की बुवाई व देखभाल वैज्ञानिक तरीके से करें तो कम लागत में अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। किसान खेती के लिए समयानुसार उपयुक्त प्रजाति का बीज का चयन करें। बीज में फफूंद जनित रोगों की रोकथाम के लिए प्रति किलो बीज में 2.5 ग्राम कारबेडिजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी बायोपेस्टिसाइड का प्रयोग करें। इसके बाद बीज को जैव उर्वरक और नैनो डीएपी से उपचारित कर बुवाई करें। उन्होंने कहा कि खेती में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण व मृदा स्वास्थ्य कार्ड की संस्तुतियों के अनुसार ही करें। प्रति बीघा खेत में 24 किग्रा यूरिया, 14 किग्रा डीएपी और 6 किग्रा एमओपी का प्रयोग लाभकारी होता है।
बुवाई के समय कुल डीएपी व एमओपी और यूरिया का एक तिहाई लगभग आठ किग्रा भाग अवश्य डालें। शेष यूरिया की एक तिहाई मात्रा पहली सिंचाई के बाद और अंतिम एक तिहाई मात्रा 55 से 60 दिन बाद टॉप ड्रेसिंग के रूप में करें। दूसरी टॉप ड्रेसिंग में दानेदार यूरिया की जगह नैनो यूरिया का छिड़काव करें। सीड कम फर्टी ड्रिल सुपर सीडर या हैप्पी सीडर जैसे आधुनिक यंत्रों से बुवाई करने पर बीज और उर्वरक का सही प्लेसमेंट होता है। इससे बीज की बचत के साथ पौधों की वृद्धि भी बेहतर होती है। गेहूं की फसल में बुवाई के 21वें दिन पहली सिंचाई हल्की करनी चाहिए। इस समय पौधे की जड़ें अत्यधिक संवेदनशील होती हैं। समय पर सिंचाई करने से पौधों की वृद्धि और दाने का विकास अच्छा होता है। गेहूं का प्रमुख खरपतवार, फेलरिस माइनर (गेहूं का मामा) है जो समय से नियंत्रित न होने पर पैदावार प्रभावित करता है। इसका समय से उचित नियंत्रण करें।