सिद्धार्थनगर। दोपहर की तपिश में शहर के चौक-चौराहों पर ठेले और छोटी दुकानों पर ठंडा-ठंडा का शोर है। मैंगो शेक, जूस, लस्सी और शरबत के गिलास तेजी से बनते और बिकते दिखते हैं, लेकिन जब 40 रुपये में एक गिलास मैंगो जूस और 25-30 रुपये में शेक मिल रहा है, तो सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है...क्या इसमें सच में फल है?
जगह-जगह किए गए अवलोकन में सामने आया कि कई दुकानों पर शेक और जूस बनाने की प्रक्रिया चौंकाने वाली है। एक ठेले पर दुकानदार ने पहले से तैयार पीले रंग के सिरप को गिलास में डाला, उसमें पतला दूध या पानी मिलाया और कुछ सेकंड में मैंगो शेक/जूस तैयार कर दिया। कई जगह असली फल का इस्तेमाल बेहद सीमित या बिल्कुल नहीं दिखा। स्ट्रॉबेरी और अन्य फ्लेवर के नाम पर भी तेज रंग वाले सिरप और एसेंस का ही सहारा लिया जा रहा है।
बाजार के जानकार बताते हैं कि लागत घटाने के लिए कई जगह आर्टिफिशियल फ्लेवर, सिंथेटिक कलर, सैकरीन जैसे स्वीटनर और गाढ़ापन बढ़ाने वाले पाउडर का उपयोग किया जा रहा है। इससे बिना फल के भी फल जैसा स्वाद तैयार कर लिया जाता है। फूड सेफ्टी विभाग सैंपलिंग और कार्रवाई की बात करता है, लेकिन जमीनी हकीकत में ठेलों और छोटी दुकानों पर बिना लाइसेंस और बिना नियमित जांच के ये ड्रिंक्स खुलेआम बिक रहे हैं। इससे निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
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कीमत का गणित, जो खोल रहा पूरा खेल
- स्थानीय मंडी में आम 60-65 रुपये और फुटकर ठेलों पर 90-100 रुपये किलो बिक रहा है। दुकानदार बताते हैं कि एक गिलास जूस के लिए करीब 150-200 ग्राम आम चाहिए, यानी सिर्फ फल की लागत ही 15-20 रुपये बैठती है। इसमें चीनी, बर्फ, पानी, श्रम और मुनाफा जोड़ें तो एक गिलास जूस की वास्तविक कीमत 50-60 रुपये से कम नहीं होनी चाहिए।
इसके बावजूद बाजार में यही जूस 40 रुपये में और शेक 25-30 रुपये में मिल रहे हैं। यह सीधा संकेत देता है कि या तो फल की मात्रा बेहद कम है, या फिर स्वाद और रंग के लिए फ्लेवर, सिरप और अन्य सस्ते विकल्पों का इस्तेमाल हो रहा है।
सफाई पर सवाल, संक्रमण का खतरा
- मामला सिर्फ मिलावट तक सीमित नहीं है। कई दुकानों पर बर्फ खुले में रखी मिली, जिसे बिना ढके इस्तेमाल किया जा रहा था। पानी की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं। गन्ने के रस और शरबत में इस्तेमाल हो रहा पानी और बर्फ संक्रमण का बड़ा कारण बन सकते हैं। बर्तनों की सफाई और हाथों की स्वच्छता का अभाव भी साफ दिखता है।
अस्पतालों में दिख रहा असर
- मेडिकल कॉलेज के फिजीशियन डॉ. जितेंद्र सिंह के अनुसार, गर्मी के मौसम में ऐसे मिलावटी और अस्वच्छ पेय पदार्थ सीधे पेट पर असर डालते हैं। हाल के दिनों में उल्टी-दस्त, पेट दर्द और एलर्जी के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। बच्चों और बुजुर्गों में इसका खतरा ज्यादा है और कई मामलों में फूड पॉइजनिंग तक की स्थिति बन रही है।
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40 रुपये का जूस...हिसाब समझिए
- आम (150-200 ग्राम): 15-20 रुपये
- चीनी/अन्य: 5-10 रुपये
- बर्फ, पानी, लागत : 10-15 रुपये
- कुल लागत : 30-45 रुपये कम से कम
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किस चीज में क्या मिला रहे, क्या है जोखिम
- मैंगो शेक :
मिलावट - फ्लेवर, पीला कलर, पतला दूध
जोखिम - एलर्जी, पोषण की कमी
- बनाना शेक :
एसेंस -
मिलावट - स्टार्च पाउडर
जोखिम - पाचन गड़बड़ी
- स्ट्रॉबेरी/अन्य शेक :
मिलावट - सिंथेटिक सिरप, तेज रंग
जोखिम - त्वचा एलर्जी
- लस्सी :
मिलावट : बासी/मिलावटी दही, ज्यादा पानी
जोखिम - फूड पॉइजनिंग
- शरबत:
मिलावट : सैकरीन, सिंथेटिक कलर
जोखिम - पाचन समस्या
- गन्ना जूस :
मिलावट - गंदा पानी/बर्फ
जोखिम - डायरिया, टाइफाइड
- कोल्ड कॉफी :
मिलावट - फ्लेवर पाउडर, मिलावटी दूध
जोखिम - पेट दर्द
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इस समय आम थोक में भी 60 रुपये किलो से नीचे नहीं है। एक गिलास जूस में 150-200 ग्राम आम लगता है। ऐसे में 30-40 रुपये में जूस बेचना तभी संभव है जब फल की मात्रा कम की जाए या कुछ और मिलाया जाए।
- हरिश्चंद्र साहनी, थोक फल विक्रेता
गर्मी में मजबूरी है, ठंडा पीना ही पड़ता है। सस्ता मिलता है तो ले लेते हैं, लेकिन अब भरोसा नहीं होता कि इसमें असली फल है या नहीं।
- राजेश यादव, सनई चौराहा
गर्मी के मौसम में शेक, जूस और शरबत की दुकानों की नियमित सैंपलिंग कराई जाती है। मिलावट या मानक के विपरीत सामग्री मिलने पर जुर्माना और लाइसेंस निरस्तीकरण की कार्रवाई की जाती है। उपभोक्ता भी संदिग्ध खाद्य पदार्थों की शिकायत कर सकते हैं।
- आरएल यादव, सहायक आयुक्त खाद्य सुरक्षा