फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Siddharthnagar News: कालानमक धान की खेती खोलेगी तरक्की के द्वार

विज्ञापन
विज्ञापन
श्याम सुंदर तिवारी
विज्ञापन

सिद्धार्थनगर। कालानमक धान की खेती करने वाले किसानों को आने वाले दिनों में गुणवत्ता के संकट से नहीं जूझना पड़ेगा। क्योंकि प्रशासन और कृषि विभाग ने इसके लिए मास्टर प्लान तैयार किया है। इसमें किसानों को चयनित करके उनके रकबे को एक प्रकार से गोद लिया जाएगा। इस योजना के तहत खेत की जुताई, रोपाई से लेकर कटाई और कुटाई का काम करेगा। बीज के साथ ही पूरी खेती की मॉनिटरिंग करेगा।
इसके लिए जनपद में 1200 क्लस्टर बनाए गए हैं। एक क्लस्टर में एक किसान और एक एकड़ खेत आरक्षित किया गया है। यानी जिले में 3600 बीघा कालानमक धान की खेती विभाग की निगरानी में होगी।
विज्ञापन

इस कार्य में कृषि वैज्ञानिक, कृषि विभाग से जुड़े अधिकारी व कर्मचारी शामिल होंगे। एक क्लस्टर की जिम्मेदार एक अधिकारी पर दी जाएगी। यानी 1200 लोग नोडल के रूप में खेती करवाएंगे और धान की रोपाई से लेकर मड़ाई तक होने वाले निरीक्षण की रिपोर्ट करेंगे।
विभाग के मुताबिक क्लस्टर बनाने के पीछे मूल प्रजाति को विकसित कराना और उसे बढ़ावा देना है, जिससे किसानों को लाभ मिले और जिले में खेती का रकबा बढ़ सके।
उत्पादन नहीं होने से किसान घाटे में जा रहा था : कालानमक चावल बुद्ध के प्रसाद के रूप में जाना जाता है, लेकिन पैदावार में कमी और बाजार में बिक्री न होने के कारण वर्ष 2005 के बाद रकबे में एकाएक गिरावट होने लगी।
किसानों का कहना था कि कद बड़ा होने के कारण गिरता है, जिससे कटाई में दिक्कत होती है। मजदूरी अधिक लगती है। लागत के अनुसार उत्पादन नहीं होने से किसान घाटे में जा रहा था। इसलिए खेती का रकबा कम करने लगा। स्थिति यह बनी कि 2015 तक आते- आते तीन हजार हेक्टेयर आ गया।
विभाग से जुड़े लोगों के मुताबिक 20 हजार से तीन हजार हेक्टेयर रकबे पर इसकी खेती आ गई, लेकिन वर्ष 2017 में जब भाजपा सरकार में एक जनपद एक उत्पाद में चयनित किया गया।
विज्ञापन

इसके बाद इसके प्रोत्साहन पर काम शुरू हुआ। मौजूदा 12 हजार हेक्टेयर से अधिक रकबे पर कालानमक धान की खेती हो रही है, लेकिन कई प्रजाति का धान होने के कारण गुणवत्ता पर सवाल उठने लगा। इसलिए बाजार प्रभावित हो रहा है, जिससे किसान परेशान हैं। किसान खेती से मुंह न मोड़ें और गुणवत्ता का संकट खत्म न हो जाए। इसलिए क्लस्टर प्रणाली लागू करके एक प्रजाति की खेती कृषि विभाग ने कराने की प्रक्रिया शुरू की है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें