सिद्धार्थनगर। इस बार मानसून की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं होगी कि कुल कितनी बारिश होगी बल्कि यह होगी कि बारिश कब, कितनी और कितनी देर में होगी। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के पूर्वानुमान और जुलाई के आंकलन से संकेत मिल रहे हैं कि कुल वर्षा सामान्य के आसपास रह सकती है लेकिन उसका वितरण असमान होगा।
यानी कई दिन तक बारिश नहीं होने के बाद अचानक एक-दो दिन में अत्यधिक वर्षा हो सकती है। मौसम वैज्ञानिक इसे बदलते मानसून का नया स्वरूप मान रहे हैं, जो नेपाल सीमा से सटे तराई जिले सिद्धार्थनगर के लिए खेती से लेकर बाढ़ प्रबंधन तक नई चुनौती खड़ी कर सकता है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि पहले मानसून के दौरान कई दिनों तक हल्की और मध्यम बारिश का क्रम बना रहता था, जिससे खेतों में नमी बनी रहती थी और नदियों का जलस्तर भी धीरे-धीरे बढ़ता था। अब स्थिति बदल रही है। मौसम विज्ञान केंद्र, लखनऊ के मौसम विज्ञानी डॉ. अतुल कुमार सिंह कहते हैं कि कम समय में अत्यधिक वर्षा होने से पानी जमीन में जाने के बजाय बह जाता है।
इससे एक ओर धान के खेतों में जलभराव होता है तो दूसरी ओर कुछ दिन बाद बारिश रुकने पर नमी की कमी भी होने लगती है। यही असमान वितरण किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता है।
जिले में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है और जुलाई रोपाई का सबसे महत्वपूर्ण महीना है। यदि रोपाई के दौरान लंबे समय तक बारिश नहीं हुई तो किसानों को सिंचाई पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा।
वहीं, कम समय में मूसलाधार बारिश होने पर खेतों में भरा पानी पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है और उर्वरकों का बहाव भी बढ़ सकता है। कृषि वैज्ञानिक किसानों को मौसम आधारित सलाह के अनुसार रोपाई, उर्वरक प्रबंधन और जल निकासी की व्यवस्था मजबूत रखने की सलाह दे रहे हैं।
भौगोलिक जानकार बताते हैं कि तराई की एक और चुनौती नेपाल के जलग्रहण क्षेत्रों से जुड़ी है। वहां होने वाली तेज बारिश का असर कुछ ही समय में जिले की राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बानगंगा और अन्य नदियों के जलस्तर पर दिखाई देता है। भारी बारिश का दौर बना तो निचले इलाकों में जलभराव, कटान और बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। यही वजह है कि प्रशासन संवेदनशील गांवों और तटबंधों पर विशेष निगरानी की तैयारी कर रहा है।