सिद्धार्थनगर। जिले में सड़क हादसों में होने वाली मौतों को शून्य पर लाने की कवायद अब कागज से जमीन पर उतरती दिख रही है। पुलिस ने जीरो फेटेलिटी डिस्ट्रिक्ट (जेडएफडी) के तहत ऐसा सिस्टम तैयार करने की शुरुआत कर दी है, जिसमें हर दुर्घटना पर मिनटों में रिस्पॉन्स और घायलों को गोल्डन ऑवर के भीतर अस्पताल पहुंचाना प्राथमिक लक्ष्य होगा।
बुधवार को पुलिस लाइंस सभागार में सभी थानों की क्रैश कंट्रोल (सीसी) टीमों को एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण दिया गया। अपर पुलिस अधीक्षक प्रशांत कुमार प्रसाद की अध्यक्षता में हुए इस प्रशिक्षण में साफ किया गया कि अब हर हादसे को रूटीन केस नहीं, बल्कि लाइफ-सेविंग ऑपरेशन की तरह लिया जाएगा।
प्रशिक्षण में ब्लैक स्पॉट (दुर्घटना संभावित स्थान) की पहचान को सबसे अहम बताया गया। अधिकारियों ने निर्देश दिए कि जहां बार-बार हादसे हो रहे हैं, वहां सिर्फ रिपोर्ट नहीं बल्कि संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर सुधार सुनिश्चित कराया जाए। सबसे ज्यादा जोर गोल्डन ऑवर पर रहा। अधिकारियों ने कहा कि दुर्घटना के बाद पहला एक घंटा जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे अहम कड़ी होता है। इसलिए सीसी टीमों को निर्देशित किया गया कि सूचना मिलते ही तत्काल मौके पर पहुंचें, प्राथमिक सहायता दें और बिना देरी के घायलों को अस्पताल पहुंचाएं।
इसके साथ ही ई-डार पोर्टल पर हर दुर्घटना की डिजिटल एंट्री, साक्ष्य संकलन और वीडियोग्राफी को अनिवार्य किया गया है, ताकि भविष्य में विश्लेषण के आधार पर दुर्घटनाओं को रोका जा सके। क्षेत्राधिकारी यातायात सुजीत राय ने साफ किया कि सिर्फ रेस्क्यू नहीं बल्कि रोकथाम पर भी उतना ही जोर होगा। ओवरस्पीडिंग, नशे में ड्राइविंग और अवैध पार्किंग के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
अधिकारियों का मानना है कि यदि तय रणनीति के अनुसार कार्रवाई हुई तो आने वाले समय में जिले में सड़क हादसों में मौतों की संख्या में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
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इसलिए जरूरी है पहल
- हाईवे और लिंक रोड पर बढ़ते हादसे
- समय पर इलाज न मिलने से बढ़ती मौतें
- ब्लैक स्पॉट की पहचान के बावजूद सुधार धीमा
- अलग-अलग विभागों में समन्वय की कमी
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सिस्टम कैसे काम करेगा
- हर थाने में सीसी टीम अलर्ट मोड पर
- सूचना मिलते ही तत्काल मौके पर पहुंचना
- मौके पर प्राथमिक राहत और ट्रैफिक कंट्रोल
- गोल्डन ऑवर में अस्पताल शिफ्ट
- ई डीआर पोर्टल पर तत्काल डेटा अपलोड
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ज़मीनी हकीकत
- कई जगह एम्बुलेंस पहुंचने में देरी
- ग्रामीण इलाकों में हादसे के बाद प्राइवेट साधनों से अस्पताल ले जाना पड़ता है
- सड़क किनारे सुरक्षा इंतजाम और संकेतक अब भी अधूरे
- रात में विजिबिलिटी और पेट्रोलिंग बड़ी चुनौती
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सख्ती भी, जागरूकता भी
- ओवरस्पीडिंग पर चालान अभियान
- ड्रिंक एंड ड्राइव पर जीरो टॉलरेंस
- हेलमेट और सीट बेल्ट चेकिंग
- स्कूल-कॉलेज स्तर पर जागरूकता अभियान
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