सिद्धार्थनगर। देवरिया जिले के सोहनपुर रेलवे क्रॉसिंग पर महिला ने तीन बच्चों के साथ इंटरसिटी एक्सप्रेस के आगे कूदकर जान दे दी। ऐसी घटनाएं केवल देवरिया तक सीमित नहीं हैं। सिद्धार्थनगर जिले में भी ऐसे अनेक परिवार हैं, जो तनाव से जूझ रहे हैं। कई बार तनाव ग्रस्त पुरुष या महिला द्वारा ऐसे कदम उठा लिए जाते हैं। मनोविज्ञानी काफी हद तक एकल परिवार और पत्नी-पति के बीच अहं (ईगो) के टकराव को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। महिला थाना, परिवार परामर्श केंद्र और परिवार न्यायालय में आने वाली शिकायतों की लंबी फेेहरिस्त परिवारों के टूटने की दास्तां बयां करने के लिए काफी है।
केस एक
महिला ने जहर खाया
बांसी कोतवाली क्षेत्र के एक गांव में पत्नी पर चरित्र पर संदेह व्यक्त करते हुए पति ने उसे छोड़ दिया था। महिला के पास एक एक बच्चा भी था। समाज के ताने से तंग आकर महिला ने जहर खाकर जान देने की भी कोशिश की, लेकिन वह बच गई। मामला महिला थाने तक पहुंचा तो समझाने के बुझाने के बाद दोनों पक्ष मान गए।
केस दो
दो बच्चों को मार डाला
ढ़ेबरुआ क्षेत्र के परसा देवचपार गांव निवासी एक महिला ने पति द्वारा चरित्र पर बार- बार सवाल करने से आहत होकर बेटे सुरेंद्र (05) और दो वर्षीय वीरेंद्र को गांव के बाहर तालाब में डुबोकर मार डाला था। बाद में बेटी को लेकर भाग गई थी। पूछताछ में पता चला कि पति की प्रताड़ना और लांछन से आहत होकर महिला ने यह कदम उठाया।
केस तीन
ट्रेन के आगे कूदने की कोशिश
मुख्यालय की कांशीराम कॉलोनी में रहने वाली महिला बीती जनवरी में ट्रेन के आगे कूदकर जान देने की कोशिश की थी। उसके साथ बच्चा भी था। समय रहते रोवांपार के पास कुछ लोगों ने उसे पकड़ लिया। महिला का आरोप था कि पति शराब का पीकर मारता था और आरोप लगाता था कि उसका बच्चा नहीं है। ऐसे में सोचा की जान दे दूं।
पांच सदस्यीय टीम जोड़ रही परिवारों को
महिला उत्पीड़न और दंपत्ती विवादों को सुलझाने के लिए महिला थाने में नई किरण सुनवाई की शुरूआत हुई थी। इसके लिए थाने के निरीक्षक को अध्यक्ष नामित किया गया है। कांउसलर की टीम में सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव, सुषमा श्रीवास्तव, विनय कांत मिश्र और एडवोकेट समसुल हक की टीम दंपत्तियों को समझाकर परिवारों को जोड़ रही है।
2018 में पारिवारिक विवाद के 199 मामले निस्तारित
महिला थाना के आंकड़ों के अनुसार पति-पत्नी के विवाद से संबंधित वर्ष 2018 में 355 मामले आए थे। इसमें 199 मामलों का सुलह समझौता के बाद निस्तारण किया गया। 62 ऐसे मामले थे जो न्यायालय से संबंधित थे। नौ मामलों में बात नहीं बनने पर दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज किया गया। 80 ऐसे मामले हैं, जिनमें अभी सुनवाई चल रही है। जबकि 2017 में केवल 300 मामले आए थे।
परिवार की संरचना और संयुक्त परिवार का बिखराव इसका प्रमुख कारण है। संयुक्त परिवार में जो भी बातें होती हैं वह साझा हो जाती हैं। मौजूदा दौर में ऐसा नहीं है। एक दूसरे का अहं (ईगो) भी रिश्तों को तोड़ रहा है। इस कारण पति और पत्नी के बीच विवाद बढ़ते जा रहे हैं। जहां तक संभव हो लोगों को संयुक्त परिवार में रहना चाहिए।
प्रो. सुषमा पांडेय, विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान, गोरखपुर विवि