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नेपाल को बाढ़ व नौ जिलों को सूखे से मिलेगी निजात

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श्रावस्ती। नेपाल व भारत के बीच विवाद का एक कारण राप्ती नदी पर बना बैराज भी रहा है। नेपाल हमेशा से यह दावा करता रहा है कि राप्ती बैराज के कारण नेपाल के लो लैंड क्षेत्र में बाढ़ आती है। यहां तक कि माओवादी आंदोलन के समय आंदोलनकारियों ने इस बैराज को ब्लास्ट करने का प्रयास भी किया था। सरयू परियोजना से नेपाल की इस समस्या का समाधान हो जाएगा।
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भारत व नेपाल का संबंध हमेशा से रोटी व बेटी का रहा है। लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे है जो दोनों देशों के बीच कटुता को हमेशा बढ़ावा देते रहे है। इसमें से एक मुद्दा राप्ती बैराज भी रहा है। यह मुद्दा नेपाल में सड़क से लेकर संविधान सभा तक गूंजा। यहां तक कि इस बैराज को लेकर भारत नेपाल समन्वय समिति की कई बैठकों में नेपाल ने अपनी आपत्ति भी जताई। नेपाल का दावा था कि राप्ती नदी नेपाल से निकल कर भारत में पहुंचती है। लेकिन भारत में पहुंचते ही इसे राप्ती बैराज पर शटर लगा कर रोक दिया गया। यही नहीं इसके दोनों ओर भारत सरकार ने तटबंध निर्माण करके इसकी जलधारा को समेट दिया। जब राप्ती बैराज पर नदी का जलस्तर 127.70 मीटर होता है।
उस समय नेपाल के निचले इलाकों में तबाही मच जाती है। घर डूब जाते हैं व लोग विस्थापित हो जाते हैं। ऐसे में नेपाल की मांग थी कि राप्ती बैराज को तोड़ दिया जाए। यहां तक कि इस बैराज को तोडने के लिए नेपाल में हुए माओवादी आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी राकेट लांचर सहित अन्य हथियार लेकर सीमा तक आ गए थे। लेकिन सीमा पर उस समय सीमा पुलिस की तैनाती होने के कारण केवल वह भारत विरोधी नारे लगा कर लौट गए थे। उस समय नेपाल का यह भी दावा था कि राप्ती बैराज का क्षेत्र भारतीय नहीं बल्कि नेपाली भूभाग है। इसके लिए वह राप्ती बैराज के तट पर स्थित जगपति धाम मंदिर के संस्थापक पहाड़ी बाबा को आधार बताते थे। माओवादियों का दावा था कि पहाड़ी बाबा की उम्र 150 वर्ष से अधिक है। और वह वहां बचपन से रह रहे थे।
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यह हिस्सा नेपाल में था। लेकन नदी के कटान के चलते यहां सीमा के निशान खत्म हो गए। माओवादियों के इस दावे को नेपाल सरकार ने फिलहाल कभी विवाद का विषय नहीं माना। लेकिन आंदोलनकारी इसे लगातार अपने प्रमुख मुद्दों में शामिल करते रहे। आंदोलन के साथ यह दावा तो समाप्त हो गया। लेकिन राप्ती बैराज के कारण नेपाल में आने वाली बाढ़ दोनों देश के बीच तनाव का कारण बना रहा। अब जब सरयू परियोजना से राप्ती बैराज जुड़ गया है तो ऐसी स्थिति में अब पानी का डायवर्जन दोनों दिशाओं में एक साथ हो जाएगा। ऐसे में बाढ़ जैसी स्थित भविष्य में आएगी ही नहीं जिसके चलते नेपाल की इस समस्या का समाधान अपने आप सरयू राष्ट्रीय परियोजना को हरी झंडी दिखाते हुए समाप्त हो जाएगी।
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