उम्रकैद की सजा पाई महिला को हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी करीब 20 साल में ही काटने पड़े क्योंकि महिला को जमानत लेने वाला कोई नहीं मिला।
इतना ही नहीं सजा पाने के समय गर्भवती रही इस महिला ने अपने बेटे को जेल में ही जन्म दिया।
मामला हाईकोर्ट के संज्ञान में आने के बाद इन हालात पर न्यायाधीश भी आवाक रह गए।
अपील पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए अपर महाधिवक्ता विधू भूषण सिंह को एमिकस क्यूरी नियुक्त कर दिया है।
उनसे प्रदेश भर की जेलों में बंद ऐसे लोगों की जानकारी मांगी गई है जो जमानत मिलने के बाद भी रिहा नहीं हो पा रहे हैं।
कैदियों के स्वास्थ्य और हालात की जानकारी भी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति विनोद प्रसाद और न्यायमूर्ति अंजनि कुमार मिश्र की खंडपीठ ने अधिकारियों के इस लापरवाही भरे रवैये पर आश्चर्य जताते हुए कहा है कि इन करीब 20 वर्षों के दौरान जिलाधिकारी और जिला जज गण क्या करते रहे।
जेलों के मुआयने में उनका ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया। ऐसा प्रतीत होता है मुआयना सिर्फ औपचारिकता वश खानापूर्ति के लिए किया जाता है।
न्यायालय ने कहा कि राज्य ने उस महिला के प्रति आपराधिक कार्य किया है इसलिए वह मुआवजा पाने की हकदार है। कोर्ट ने पीड़ित महिला विजय कुमारी को मात्र पांच हजार रुपये के बांड पर तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।
अदालत में मौजूद उसके 19 वर्षीय बेटे कन्हैया को हिंदी में यह जानकारी दी गई। प्रकरण के मुताबिक विजय कुमारी को अलीगढ़ की अदालत ने हत्या के मामले उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
सजा के खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। हाईकोर्ट ने 10 जनवरी 1994 को उसकी जमानत मंजूर करते हुए व्यक्तिगत मुचलके और बंधपत्र पर रिहा करने का आदेश दिया। उस वक्त वह गर्भवती थी।
विजय कुमारी को जमानत लेने वाला कोई नहीं मिला इसलिए उसकी रिहाई नहीं हो सकी। इस दौरान उसने एक बेटे को जन्म भी दिया। जमानत का इंतजाम न हो पाने के कारण वह जेल में ही बंद है।