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Shamli News: मतदाताओं को घर-घर जाकर बताना पड़ता था वोट डालने का तरीका

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ऊन। अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव की तैयारी शुरू हो गईं है। संभावित प्रत्याशियों ने लोगों का मन टटोलना भी शुरू कर दिया है। आजादी के समय हाथ उठाकर चुनाव होता था। बाद में बैलेट पेपर आए उस दाैर में तो प्रत्याशी और उनके समर्थकों को घर-घर जाकर मतदाताओं को वोट डालने का तरीका बताना पड़ता था।
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ग्राम पंचायत पिंडोरा के निवासी चौधरी सुखबीर सिंह बताते हैं कि गांव में वर्ष 1952 में पहली बार गांव की चौपाल पर हाथ उठाकर चौधरी आशाराम मुखिया को ग्राम प्रधान चुना गया था। उसके बाद वर्ष 1957 में चौधरी दरियाव सिंह और 1962 में हाथ उठाकर ही चौधरी रणवीर सिंह को चुना गया ,जो सात साल तक प्रधान रहे। इसके बाद हाथ उठाकर ग्राम प्रधान चुनने की परंपरा बंद हो गई। 1970 में गांव में बैलेट पेपर से पहला चुनाव रकम सिंह तथा लहरी सिंह के बीच हुआ था, जिसमें रकम सिंह उपाध्याय विजयी हुए थे। रकम सिंह 11 वर्ष तक प्रधान रहे। इसके बाद से गांव में लगातार बैलेट पेपर से ही ग्राम प्रधान चुने जा रहे हैं।
2005 में ऊषा बनी गांव की पहली प्रधान : गांव पिंडोरा में पहली महिला ग्राम प्रधान 2005 में उषा रानी चुनी गईं। उसके बाद 2010 में भी कमलेश महिला ग्राम प्रधान चुनी गंई। 2021 में हुए चुनाव में शिमला देवी ग्राम प्रधान चुनी गईं। गांव के सतपाल सिंह तीन योजनाओं तक ग्राम प्रधान रहे हैं। पिंडौरा गांव का इतिहास : पिंडौरा गांव की आबादी करीब 15 हजार है। यहां पर सात हजार मतदाता है। यह गांव जाट बहुल है। हालांकि, यहां पर सभी जातियों के लोग रहते हैं। यहां पर गुरु गोरखनाथ की म्हाडी पर हर साल मेला भरता है, जिसमें अन्य स्थानों के लोग भी पहुंचते हैं। पूर्व प्रधान हरेंद्र बताते हैं कि बुजुर्ग कहते थे कि महाभारत काल में पांण्डव यहां से होकर कुरुक्षेत्र गए थे, जिसके कारण इसका नाम पिंडोरा पड़ा था। यहां पर जाट बिरादरी के लोग ही प्रधान चुनने में अहम भूमिका निभाते हैं। हर बार यहां पर ग्राम प्रधान जाट ही चुने जाते हैं।
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