शामली। गांव भैंसवाल के नहर मजरा के ग्रामीण होलिका के पूजन की परंपरा से दूर हैं। वह दुल्हैंडी के दिन प्रहलाद की पूजा करते हैं। लोग सदियों से इस परंपरा का पालन कर रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। कुछ लोग इसे किसी पुराने श्राप या अप्रिय घटना का परिणाम मानते हैं, जबकि कुछ इसे प्राचीन रीति के रूप में देखते हैं। ग्रामीण होलिका दहन से पहले होलिका की पूजा-अर्चना नहीं करते हैं। इसके बजाय वे होलिका दहन करते हैं। दहन से पूर्व लकड़ी और उपले एकत्रित करते हैं। दहन के समय पारंपरिक गीत और नृत्य करते हैं, गुलाल लगाते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। ग्रामीणों ने बताया कि नोनिया चौहान वंश के मजरे में वर्तमान में करीब 500 लोग रह रहे हैं। यह मजरा भैंसवाल गांव की ग्राम पंचायत में आता है।ӏ
बोले लोग
अंग्रेजों के समय पूर्वी यमुना नहर खोदाई में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से मजदूरी करने आए सुखवीर सिंह, जगरुप और सुरेंद्र बताते हैं कि होलिका की पूजन न करके भी दहन करते हैं। दुल्हैंडी के दिन होलिका दहन स्थल पर होलिका राख पर गंगाजल छिड़ककर, फूलों और दीप प्रज्वलित कर प्रहलाद की पूजा करते हैं। त्योहार पर पकवान बनाकर प्रसाद के रूप में आपस में वितरित करते हैं।
वंशज और क्षेत्रीय विस्तार
सहारनपुर के 42 गांवों में भैंसवाल नहर माजरा, मानकपुर, भनेड़ा उद्डा, जंधेडी, गोहरनी, पटनीपरतापुर समेत वंशज मौजूद हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से इनके वंशज यहां आ बसे हैं।