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लोहे पर छाई महंगाई, नई ट्रालियों के आर्डर हुए बंद

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लोहे पर छाई महंगाई, नई ट्रालियों के आर्डर हुए बंद
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शामली। एक तरफ कोरोना की मार और दूसरी तरफ लोहे पर छाई महंगाई से ट्राली बनाने वाले कारीगरों के सामने संकट खड़ा हो गया है। ट्राली बनाने के ऑर्डर मिलने बंद हो गए हैं। केवल मरम्मत का कार्य चल रहा है। ट्राली निर्माण का कार्य मार्च से नवंबर तक ज्यादा रहता था लेकिन नई ट्रालियों के आर्डर नहीं मिलने से कारीगर परेशान हैं।
शामली शहर कृषि यंत्रों के निर्माण के लिए देश भर मेें विख्यात है। यहां की बुग्गी, रिम-धुरा, ट्रालियां हरियाणा और पंजाब के किसान खरीद कर ले जाते हैं। शामली में ट्राली निर्माण और मरम्मत की करीब 25 वर्कशॉप संचालित हैं। इन पर सीजन में करीब 80 से 100 नई ट्रालियां बनाई जाती थीं। 500 से ज्यादा करीगर इन पर काम करते हैं, लेकिन कोरोना की मार और लोहे पर छाई महंगाई के कारण नई ट्रालियां बनाने का काम लगभग ठप हो गया है। हरियाणा में ट्रालियाें की मांग घट गई है। कारीगरों के सामने संकट खड़ा हो गया है। ट्राली निर्माताओं को कहना है कि किसान पुरानी ट्रालियों की ही मरम्मत कराकर काम चला रहे हैं।
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80 रुपये किलो तक पहुंचे लोहे के दाम
शामली। दिल्ली रोड पर खान एग्रीकल्चर रिपेयरिंग वर्क्स का संचालन करने वाले नईमुद्दीन और खेड़ी करमू निवासी मोहम्मद यासीन का कहना है कि हरियाणा के पानीपत, सोनीपत, रोहतक, करनाल समेत कई जिलों से किसान गेहूं और धान की कटाई के मौके पर ट्रालियां का निर्माण के लिए आर्डर देते थे। पिछले दो सालों से कोरोना, लोहे की महंगाई और दिल्ली में किसान आंदोलन के कारण हरियाणा के किसानों के आर्डर आने बंद हो गए हैं। ट्रॉली बनाने के लिए दो साल पहले 60 रुपये किलो लोहे की चादर मिल जाती थी। अब लोहे की चादर 80 रुपये किलो मिल रही है। पहले डेढ़ से दो लाख रुपये की ट्राली 20-22 क्विंटल की बनकर तैयार हो जाती थी। अब यह ट्राली ढाई लाख रुपये में बनकर तैयार हो रही है।
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मांग नहीं होने से गिर गया उत्पादन
शामली। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व चेयरमैन वेदप्रकाश आर्य का कहना है कि कोरोना काल में लोहे के दाम में भारी उछाल आने से बुग्गी, ट्राली, रिम-धुरा, टायर-ट्यूब की मांग घटी है। 70 से लेकर 80 प्रतिशत उत्पादन कम हुआ है। लोहे का रेट पिछले साल जुलाई में 35 रुपये किलो था। जुलाई 2021 में 67 रुपये से लेकर 70 रुपयेे प्रति किलो हो गया है। लोहे की चादर और महंगी है। किसान लोहे के उत्पाद नहीं खरीद पा रहे। उद्यमियों के सामने वित्तीय संकट पैदा हो गया है। कोरोना काल के बाद गए माल का भुगतान भी नहीं आ रहा है।
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