कैराना लोकसभा सीट 1962 में अस्तित्व में आई थी। 70 के दशक में बाबू हुकुम सिंह ने सेना छोड़कर राजनीति में कदम रखा। 1974 में वह यहां से विधायक बने। हुकुम सिंह यहां से लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीते। 2014 में भाजपा ने हुकुम सिंह को लोकसभा का टिकट दिया। मोदी लहर में उन्हें पांच लाख से ज्यादा वोट मिलीं। सपा के नाहिद हसन को उन्होंने करीब दो लाख वोटों से हराया। हुकुम सिंह के निधन के बाद उनकी बेटी मृगांका सिंह ने उनकी राजनीतिक विरासत संभाली। पार्टी ने 2018 लोकसभा उपचुनाव में उन्हें टिकट दिया, लेकिन वह गठबंधन की घेराबंदी से हार गईं।
हसन परिवार की तीसरी पीढ़ी राजनीति में
70 के दशक में यहां हसन परिवार के अख्तर हसन का सियासी दबदबा था। वह कांग्रेस से सांसद रहे। उनके पुत्र मुनव्वर हसन के नाम सबसे कम उम्र में लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा और विधान परिषद में पहुंचने का रिकॉर्ड है। वह दो बार विधायक, दो बार सांसद और एक बार राज्यसभा और एक बार विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं। मुनव्वर के बाद उनकी पत्नी तबस्सुम हसन ने उनकी राजनीतिक विरासत संभाली और 2009 में वह बसपा के टिकट से सांसद चुनी गईं। 2014 में हुकुम सिंह के लोकसभा में जाने के बाद रिक्त हुई कैराना विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सपा के टिकट पर हसन परिवार के नाहिद हसन चुनाव जीते। सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद रिक्त हुई इस सीट पर गठबंधन ने रालोद के सिंबल पर तबस्सुम हसन को टिकट दिया और उन्होंने भाजपा से सीट छीन ली।
गुर्जर बिरादरी के हैं दोनों परिवार
दोनों परिवारों का स्थानीय निकाय से लेकर जिला पंचायत और प्रधानी के चुनाव तक में दबदबा रहता है। छात्र संघ चुनाव की राजनीति भी इन दोनों परिवारों के आसपास घूमती है। प्रत्याशी विजयी पताका लहराने के लिए इन परिवारों का समर्थन हर हाल में हासिल करना चाहते हैं।
पहले हर मामलों में लेते थे एक-दूसरे की सलाह
स्वर्गीय बाबू हुकुम सिंह के भतीजे कलस्यान खाप के चौधरी रामपाल सिंह और पोते अनुज चौधरी बताते हैं कि पहले हसन परिवार से उनके मधुर संबंध थे। किसी भी मामलों में एक-दूसरे से सलाह ली जाती थी, लेकिन वर्ष 1989 में हसन परिवार का टिकट कटने के बाद दोनों परिवारों में संबंध पहले जैसे नहीं रहे। हालांकि शादी समारोह में आना-जाना है। अनुज चौधरी का कहना है कि भाजपा प्रत्याशी प्रदीप चौधरी को मजबूती के साथ चुनाव लड़वाया जाएगा। हसन परिवार की इकरा हसन का कहना है कि राजनीति के चलते राहे जुदा हैं, लेकिन शादी-समारोह में अभी भी दोनों परिवार एक-दूसरे के यहां पहुंचते हैं।
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