शामली। कोरोना संक्रमण काल में लोगों का होम्योपैथी पर विश्वास बढ़ा है। पिछले साल जब कोरोना के केस बढ़ने शुरू हुए तो होम्योपैथी के इम्युनिटी बूस्टर आर्सेनिक एल्बम-30 कारगर साबित हुआ। चिकित्सकों का कहना है कि यह इम्युनिटी बूस्टर संक्रमण रोकने में मदद करता है।
जिले में पिछले साल 24 मार्च को कोरोना का पहला केस आया था। इसके बाद कोरोना के केस बढ़ने शुरू हुए तो लोगों में डर का माहौल बना। उपचार का भी रास्ता नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में होम्योपैथी पर लोगों का भरोसा किया। होम्योपैथी की इम्युनिटी बूस्टर आर्सेनिक एल्बम-30 लोगों का सहारा बना। लोगों ने इसका इस्तेमाल कर कोरोना संक्रमण से बचाव किया। जिला होम्योपैथी विभाग की तरफ से भी इम्युनिटी बूस्टर का जगह-जगह वितरण किया गया और लोगों को इसके प्रति जागरूक किया गया। जिला होम्योपैथिक चिकित्साधिकारी डॉ. विधु शेखर ने बताया कि आर्सेनिक एल्बम-30 इम्युनिटी बूस्टर है और शरीर में संक्रमण रोकने में कारगर है। पिछले साल आयुष मंत्रालय के निर्देश पर कोरोना काल के दौरान इम्युनिटी बूस्टर का जगह-जगह वितरण किया गया। इस बार फिर से कोरोना के केस बढ़ रहे हैं तो फिर से इस इम्युनिटी बूस्टर का वितरण करने की तैयारी की जा रही है।
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जिले में होम्योपैथी की मात्र दो डिस्पेंसरी
जिले में होम्योपैथी की मात्र दो डिस्पेंसरी हैं, जिनमें एक कस्बा बनत में और दूसरी जलालाबाद क्षेत्र के गांव नागल में है। नागल में जिला होम्योपैथिक चिकित्साधिकारी डॉ. विधु शेखर मलिक मरीजों का उपचार करते हैं जबकि बनत में डॉ. अंकुश कुमार की डयूटी रहती है। डॉ. विधु शेखर मलिक का कहना है कि नागल डिस्पेंसरी में करीब 50 मरीज और बनत में 60 से 70 मरीज रोज आते हैं। दोनों डिस्पेंसरी पर पर्याप्त मात्रा में लगभग 350 तरह की दवाएं उपलब्ध हैं। उनका कहना है कि होम्योपैथी में सर्जरी के बिना गंभीर रोगों का उपचार संभव है। उन्होंने बताया कि जिला योजना में 19 डिस्पेंसरी खोले जाने का प्रस्ताव भेजा गया है। प्रस्ताव स्वीकृत होने पर जिले के प्रत्येक ब्लाक स्तर व गांवों में डिस्पेंसरी खोली जाएगी, जिससे मरीजों को होम्योपैथी का ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सकेगा।
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होम्योपैथी का इतिहास
होम्योपैथी की खोज जर्मन चिकित्सक डॉ. किश्वन फ्रेडरिक सैमुएल हैनीमैन ने की थी। यह पद्धति सम समम्शमयति या समरूपता दवा सिद्धांत पर आधारित चिकित्सीय प्रणाली है। इस पद्धतियों में रोगियों का उपचार न केवल होलिस्टिक दृष्टिकोण के माध्यम से बल्कि रोगी की व्यक्तिवादी विशेषता को समझकर किया जाता है। होम्योपैथी भारत में लगभग 200 साल पहले शुरू हुई थी। आज यह देश में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।