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अल्लाह की इबादत करने वाले को मिलती है जन्नत

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कैराना। मुकद्दस रमजान-उल-मुबारक का महीना शुरू हो रहा है। मान्यता है कि अल्लाह ताला अपने बंदों को खास रहमते और बरकतें अता करता है। इस मुबारक महीने में मुसलमान दिन-रात अल्लाह ही इबादत में जुटे रहते हैं। रमजान में अल्लाह की इबादत करने वाले शख्स को जन्नत मिलती है। रोजा इंसान को तमाम बुराइयों से बचने की प्रेरणा देता है। फितरे, जकात का भी इसमें बड़ा महत्व है। रात्रि में विशेष नमाज तरावीह में पवित्र कुरआन की तिलावत की जाती है।
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रमजान-उल-मुबारक का पवित्र माह शुरू होते ही अकीदतमंद अल्लाह की इबादत में जुट जाते हैं। मौलाना मुरसलीन अहमद रशीदी ने बताया कि इस्लाम मजहब में अच्छे इंसान का मुसलमान होना ही काफी नहीं, बल्कि बुनियादी पांच कर्तव्यों को अमल में लाना आवश्यक है। पहला ईमान, दूसरा नमाज, तीसरा रोजा, चौथा हज और पांचवां जकात। यह उन मनुष्य के लिए प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा स्वत: पैदा कर देते हैं। रमजान में रोजे को अरबी में सोम कहते हैं, जिसका मतलब है रुकना। रोजा यानी तमाम बुराइयों से परहेज करना। रोजे में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी व्यक्ति की बुराई कर रहे होते हैं, तो रोजेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है। जब मुसलमान रोजा रखता है, उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।
जकात इसी महीने में अदा की जाती है। रोजा झूठ, हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसका अभ्यास पूरे एक महीना कराया जाता है, ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे। कुरआन में अल्लाह ने फरमाया कि रोजा तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज किया है, ताकि तुम खुदा से डरने वाले बनो और खुदा से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर विनम्रता तथा कोमलता पैदा करें। रमजान के इस सबसे पाक महीने में हर कोई व्यक्ति संयम और समर्पण की भावना से पूरी तरह अल्लाह की इबादत करता है। उसे गुनाहों की माफी भी मिल जाती है।
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तीन अशरों में बांटा गया रमजान
मौलाना मुरसलीन अहमद रशीदी के मुताबिक इस्लामिक कैलेंडर के हिसाब से मुकद्दस रमजान-उल-मुबारक का महीना नौवां महीना होता है। मुसलमानों के लिए यह महीना विशेष महत्व रखता है। इस माह को तीन हिस्सों में बांटा गया है, यानी कि दस-दस दिन का अशरा। इनमें पहला अशरा रहमत वाला, दूसरा अशरा मगफिरत वाला और तीसरा अशरा जहन्नुम की आग से निजात दिलाने वाला बताया जाता है। हजरत पैगंबर मोहम्मद साहब ने रमजान को अल्लाह का महीना बताया है। मुसलमान रमजान में ज्यादातर वक्त नमाज व कुरआन पढ़ने तथा अल्लाह की इबादत में ही गुजारते हैं। इस पवित्र महीने में हर शख्स को अपनी गलतियों को सुधारने का मौका मिलता है। रमजान का आखिरी अशरा जहां जहन्नुम से निजात वाला है, वहीं इसमें चुनिंदा रातों की अहमियत हजारों रातों से भी अधिक बढ़ जाती है। ये रात हैं 21, 23, 25, 27 व 29 रमजान की। इन रातों में मुसलमानों को शब-ए-कद्र की रात तलाशनी चाहिए। शब-ए-कद्र का अर्थ है ऐहतराम वाली रात। सालभर में आने वाली यह एकमात्र रात एक हजार महीनों से बेहतर है। इसमें सच्चे मन से दुआ मांगने वाले शख्स की दुआएं कुबूल होती है।
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