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वेस्ट यूपी ने खो दिया गुर्जर क्षत्रप

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वेस्ट यूपी ने खो दिया गुर्जर क्षत्रप
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शामली। कैराना सांसद हुकुम सिंह के निधन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गुर्जर राजनीति को गहरा धक्का लगा है। वह शामली और मुजफ्फरनगर ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी गुर्जर नेता के तौर पर उनकी अलग ही पहचान थी। हुकुम सिंह वैसे कभी जाति- बिरादरी के नाम पर राजनीति नहीं की, लेकिन वह गुर्जर बिरादरी के लिए किसी स्तंभ से भी कम नहीं थे। उनका सभी लोग आदर करते थे।
शामली जिले में कैराना क्षेत्र के गुर्जर उनके लिए पूरी शिद्दत से साथ देते थे। कैराना क्षेत्र के गुर्जर बहुल गांवों में सिर्फ हिंदू गुर्जर नहीं, बल्कि मुसलिम गुर्जर भी उनका पूरी मान सम्मान करते थे। जनता के इसी समर्थन की बदौलत हुकुम सिंह सात बार विधायक चुने गए। 1996 से 2012 तक वह कैराना विधानसभा सीट से लगातार विधायक का चुनाव जीतते रहे और फिर 2014 में कैराना लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे।
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शामली जिले में गुर्जरों के दो नेता रहे, जिनमें एक हुकुम सिंह और दूसरे वीरेंद्र सिंह। हुकुम सिंह के निधन से गुर्जर बिरादरी का एक बड़ा नेता खो गया है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में हो पानी मुश्किल है।
बेटी को चुनाव जिताने का सपना रह गया अधूरा
सांसद हुकुम सिंह ने अपनी विरासत बेटी मृगांका को सौंपने के लिए पूरा प्रयास किया। 2014 में कैराना विधानसभा सीट के उपचुनाव में उन्होंने अपने भतीजे अनिल चौहान को चुनाव लड़ाया था, जो करीब एक हजार वोटों से हार गए थे, लेकिन 2017 के चुनाव में उन्होंने अपनी बेटी मृगांका सिंह को भाजपा प्रत्याशी बनवाया। इस कारण अनिल चौहान ने बगावत कर दी और वह रालोद में शामिल हो गए थे। सांसद हुकुम सिंह ने बेटी मृगांका सिंह को जिताने के लिए भरसक प्रयास किया और गांव दर गांव सभाएं तथा जनसंपर्क करते रहे थे, लेकिन मृगांका सिंह चुनाव जीत नहीं पाई थीं।
शामली में भी गरमा गया था माहौल
मुजफ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा सितंबर 2013 में हुआ था, लेकिन उससे दो महीना पहले ही जुलाई में शामली में उत्तराखंड निवासी एक युवती के साथ गैंगरेप होने के बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया था, तब हुकुम सिंह और सुरेश राणा ने शामली में शिवचौक पर भाजपाइयों के साथ धरना प्रदर्शन किया था। सपा सरकार में शामली पुलिस अधीक्षक अब्दुल हमीद ने भाजपाइयों पर लाठीचार्ज कर दिया था, जिसके बाद यह मुद्दा खूब गूंजा था। व्यापारियों और भाजपाइयों ने आंदोलन किया और शहर बंद कर दिया था, जिस कारण सरकार दबाव में आ गई थी और एसपी का तबादला करना पड़ गया था।
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मुजफ्फरनगर दंगे में नहीं कर सके थे गिरफ्तारी
कवाल कांड के बाद मुजफ्फरनगर के गांव नंगला मंदौड़ में जब महापंचायत हुई थी, तो उसमें सांसद हुकुम सिंह भी शामिल हुए थे। इसके बाद दंगा भड़क गया था, जिसके बाद भाजपाइयों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए थे। उनमें से भाजपा विधायक सुरेश राणा, संगीत सोम और अन्य नेताओं की गिरफ्तारी की गई थीं तथा रासुका भी लगी थी, लेकिन हुकुम सिंह के राजनीतिक कद की वजह से तत्कालीन सपा सरकार उन्हें गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं कर सकी थी।
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