चार साल पहले मुजफ्फरनगर दंगे के कारण एक झटके में जिंदगी बेपटरी हो गई थी। एक समुदाय के काफी लोगों को रातों रात गांव छोड़कर शरणार्थी बनना पड़ा था। जैसे जैसे समय बीता और जिंदगी की व्यस्तता बढ़ी, तो दंगे के जख्म भरने लगे, मगर समस्याओं से भरा जीवन और रोजगार का अभाव आज भी उस दर्द को कम नहीं होने देता है।
सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर के नंगला मंदौड़ महापंचायत होने के बाद भड़की सांप्रदायिकता की चिंगारी ने मुजफ्फरनगर के साथ ही शामली जिले के भी कई गांवों को अपनी चपेट में ले लिया था। गांव लांक, लिसाढ़, फुगाना, हसनपुर और बहावड़ी आदि गांवों में मारकाट हुई थी, जिस कारण दूसरे संप्रदाय के लोगों को गांव से पलायन करना पड़ गया था। इन गांवों के लोगों ने कैराना और कांधला में शरण ली थी। बाद में एनजीओ और सरकार की तरफ से दंगा पीड़ितों को आर्थिक सहायता दिलाई गई। कैराना में भूरा मार्ग पर विधायक नाहिद हसन ने दंगा पीड़ितों के आशियाना बनाने के लिए जमीन दी और मकान बनवाए। यहां नाहिद कॉलोनी में करीब 200 परिवार रहते हैं। हर किसी की यही पीड़ा है कि हमारा घर छूट गया। औने पौने दाम में मकान बेचने पड़े और अब परेशानियों में जीवन कट रहा है। बच्चों की पढ़ाई नहीं हो रही। रोजगार का कोई साधन नहीं है। मजदूरी करके परिवार का पेट भरना पड़ता है। रोजाना मजदूरी मिलना भी मुश्किल हो रहा है, जबकि जिन गांवों में वह रहते थे वहां कुछ न कुछ रोजगार मिल जाता था।
बांस और पॉलीथिन की झोपड़ी में चलता है स्कूल
भूरा मार्ग पर नाहिद कॉलोनी में रहने वाले दंगा पीड़ित परिवारों के बच्चों की पढ़ाई के लिए प्रशासन ने प्रयास किया। कैराना दूर होने की वजह से कालोनी में ही बांस और पॉलीथिन से झोपड़ी बनाई गई, जिसमें दंगा पीड़ित परिवार के बच्चों को शिक्षा दी जाती है। यहां रहने वालों को दर्द है कि दंगे में सब कुछ खो गया।
दंगा पीड़ितों से बातचीत
मन गवाही नहीं देता
-- फुगाना निवासी सुलेमान का परिवार नाहिद कॉलोनी में रहता है। सुलेमान का कहना है कि फुगाना में उनका पक्का मकान था, जो आज भी खाली पड़ा है। उसे कोई खरीदने को भी तैयार नहीं है। फुगाना लौटने के बारे में कई बार सोचा, लेकिन मन गवाही नहीं देता। चार बेटों को नाहिद कॉलोनी में मकान मिल गया, लेकिन एक बेटा अभी झोपड़ी में ही रहता है।
नहीं भूल पाते गांव की यादें
-- गांव लाक निवासी गय्यूर ने बताया कि सात सितंबर को गांव के ही एक जाट परिवार ने उन्हें अपने यहां पनाह दी थी, जिस कारण उसका परिवार बच गया था। बाद में पीएसी ने वहां से उनको बाहर निकालकर भेजा था। यहां नाहिद कॉलोनी में रहते जरूर हैं, मगर अपने गांव की याद अब भुलाए नहीं भूल पाते हैं।
मजबूरी में रहना पड़ रहा है
-- गांव लिसाढ़ निवासी मोहम्मद यासीन और फुगाना निवासी इमरान व उसके चाचा कय्यूम ने बताया कि गांव में उनके पक्के मकान थे। वह हैंडपंप लगाने का काम करते हैं। सात सितंबर को दंगा होने के बाद उनके परिवार के 35 लोग एक छोटे से मकान में 24 घंटे बंद रहे। आठ सितंबर को पीएसी के जवान उन्हें बाहर निकालकर लाए थे। गांव में उनके मकान को कोई खरीदने वाला नहीं है तथा यहां मजबूरी में छोटे से मकान में रहना पड़ रहा है। पूरा परिवार तितर बितर हो गया है, साथ ही बेरोजगारी ने जिंदगी बेकार बना दी है।