शाहजहांपुर। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए तमाम कानून न्याय के लिए जंग लड़ रही महिलाओं के लिए नाकाफी साबित हो रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्यों कि कानून के रक्षक ही भक्षक की भूमिका में आ गए हैं। इससे महिलाओं को न्याय मिलना तो दूर की कौड़ी है। न्याय के लिए आवाज उठाने वाली महिलाओं को इतना प्रताड़ित किया जाता है कि दूसरी महिला कुछ ऐसा करने से पहले हजार बार सोचने पर मजबूर हो जाए। जिले में यह स्थिति तब है जब जिले में प्रथम नागरिक, सांसद और सर्वोच्च अधिकारी के पद पर महिलाएं ही आसीन हैं।
शासन की ओर से बनाए गए तमाम कानून उनकी पीड़ा को दूर करने में कैसे असफल हो रहे हैं। सरकारी तंत्र से पीड़ित दोनों महिलाएं अपनी व्यथा कई अधिकारियों से कह चुकी हैं, लेकिन उनकी कराह सुनने वाला कोई नहीं है। पीड़ित दोनों महिलाआें से बातचीत के प्रमुख अंश...
कानून के घाघों से अब निराश हुई ‘आशा’
शहर के बिजलीपुरा मोहल्ले की रहने वाली अशोक की पत्नी आशा कानून के घाघों के पचड़े में पड़कर निराश हो गई है। दबंगों के द्वारा अगवा की गई बेटी की बरामदगी के लिए वर्ष 2013 की जनवरी से अनशन पर बैठी आशा का सत्याग्रह अब भी जारी है। वह इसे ही अपने जीवन का अंग मान चुकी हैं। शायद ही किसी कलक्ट्रेट जाने वाले व्यक्ति ने पीपल के पेड़ के नीचे अनशन पर बैठी हुई बेबस आशा को न देखा हो।
कानून पर भरोसा करके जिले के सर्वोच्च अधिकारी के कार्यालय के बाहर धरना देते वक्त आशा की सोच भी आशावादी रही होगी कि ऐसा करने से उसे उसकी बेटी वापस मिल जाएगी। वक्त गुजरने के साथ ही उसकी उम्मीद भी अब धूमिल होती जा रही है। डीएम, एसपी सहित वह सभी अधिकारियों से अपनी पीड़ा बयां कर चुकी है, लेकिन बेटी को पाने की उसकी तड़प पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। आशा ने जिले में आए सचिव अनिल कुमार से भी अपना दुखड़ा रोया। इसके बाद से जब भी कोई अधिकारी जिले में आता है, तो उसे कलक्ट्रेट में ही कड़ी सुरक्षा में नजरबंद कर दिया जाता है।
खास बात यह है कि इस दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी दो बार जिले में आए, लेकिन उससे मिलना तो दूर कलक्ट्रेट परिसर से बाहर तक नहीं निकलने दिया गया। आशा भी कानून से पूरी तरह से निराश हो चुकी है। अब तो उसका भरोसा भी कानून से उठ गया है।
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने में टूटी ‘तारा’ भी
कोतवाली क्षेत्र के वाजिदखेल मोहल्ले में हो रही प्रतिबंधित पशुओं की हत्या और तस्करी का विरोध करने की सजा तारा गुप्ता को चुकानी पड़ी। वर्ष 2014 अगस्त में तारा ने प्रतिबंधित पशुओं की तस्करी का भंडाफोड़ किया था। इस पर तारा को तत्कालीन इंस्पेक्टर वीरेंद्र यादव रात में घर से बाल से खींचते हुए कोतवाली लाए थे। इसके साथ ही उसे बुरी तरह से पीटा गया था। साथ ही अभद्रता भी की गई।
उसकी चोटों की कहानी बदन पर हुए जख्मों और मेडिकल रिपोर्ट में साफ हो गई थी। इसके बाद इस मामले की जांच हुई। फिर मजिस्ट्रियल जांच होती रही, जिसके पूरे होने से पहले ही मुकदमा एक्सपंज कर दिया गया। इसके लिए तारा ने अपनी ओर से पूरे प्रयास किए। गवाह, सुबूत सब कुछ पक्ष में होने के बावजूद भी अभी तक तारा को पीटने के आरोपी इंस्पेक्टर का बाल भी बांका नहीं हुआ। बकौल तारा, उसने मानवाधिकार आयोग और तमाम महिला संगठनाें से भी गुहार लगाई, लेकिन उसे न्याय नहीं मिला। उसने कहा कि न्याय की इस जंग में वह लड़ेगी जरूर।
तारा पिटाई प्रकरण की मजिस्ट्रेटी जांच पूरी
तारा गुप्ता पिटाई प्रकरण की मजिस्ट्रेटी जांच पूरी कर ली गई है। जांच कर रहे एडीएम प्रशासन मुनेंद्रनाथ उपाध्याय के अनुसार इस मामले में महिला की पिटाई करने के आरोपी तत्कालीन कोतवाल ने अपने बयान में खुद को निर्दोष बताया है। जांच रिपोर्ट डीएम को भेज दी गई है।